बांसुरी
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर वह दिनभर बेचती है मोर पंख लगी बांसुरी
कुछ बिक जाती है और कुछ रह जाती हैं
कुछ लोग खरीद लेते हैं प्यार से उसे पूरे पैसे दे देते हैं
और कुछ मोलभाव करते हैं और फिर खरीदते भी नहीं छोड़ कर चले जाते हैं
कुछ लोग उसे झड़प देते हैं
हटो हटो नहीं चाहिए
दिन भर मेहनत करने के बाद
बमुश्किल कुछ कमा पाती होंगी
₹10 की बेच के एक बांसुरी है न जाने कितनी बांसुरी बेच पाती होगी या
शायद कभी एक बांसुरी भी नहीं बेच पाती होगी
ना जाने कितने लोग होते होंगे उसके घर में
ना जाने वह कैसे लोग का पेट भर पाती होगी
शायद वह अकेले ही रहती होगी
शायद उसका एक बेटा होगा या शायद उसकी एक बेटी होगी
जो राह तकते रहते होंगे कि मां आएगी कुछ पैसे कमा कर लाएगी और उसका पेट भर पाएगी
सुहागन तो कहीं से नहीं लगती
पति नहीं होगा शायद या होगा भी तो शराबी होगा
या फिर बिगड़ा हुआ होगा
नहीं करता होगा देखभाल अपनी पत्नी की अपने छोटे बच्चों की
ज्यादा उम्र तो नहीं लगती इसकी मुश्किल से 35 साल होगी या 30 साल
बच्चे अभी छोटे ही होंगे इसके
तभी तो कितनी गुजारिश करती है लोगों से एक बांसुरी खरीद लो एक ही खरीद लो लोग कितने दयालु बनते हैं भिकारी को तो ₹10 देते हैं लेकिन वह एक ₹10 की बांसुरी नहीं खरीदते जो मेहनत मजदूरी कर रही है और उसे ₹2 कमाने का मौका नहीं देते
उसके पास चार पांच ही तो बांसुरी है कोई भी खरीद लें अगर वह पांच बांसुरी बेचकर कुछ पैसे कमाए गी तो अपने घर में जाकर आपके बच्चों का या फिर अपना ही पेट तो भर पाएगी
सीमा असीम
27,1,21
कॉपीराइट
वाह!! बढिया
ReplyDeleteशुक्रिया
ReplyDelete