ख़ुशी के लिए


 प्रेम को पाने के लिए प्रेम में डूबना पड़ता है

यह आग का दरिया है जलकर भस्म होना पड़ता है

यूँ ही मिल जाता किसी को प्रेम तो

मीरा दीवानी नहीं होती

जहर के प्याले को अमृत समझ नहीं पीती....


कृष्ण भी कहाँ द्रोपदी का चीर बढ़ाते

न उसकी एक पुकार पर दौड़े चले आते....


जंगलो की खाक झानते फिरे

राम वनवास में

सीता के प्रेम मे

स्वर्ण मृग का न शिकार करने जाते

भूल कर सुध बुध

प्रिय सीते सीते पुकारते रहे

वे भगवान थे फिर भी

 प्रेम को भगवान मानते रहे....


प्रेम कोई खेल नहीं

कि इंसान इसे खेले

 खुद की ख़ुशी के लिए 

दूसरों को दुःख दे दे....


आचमन नहीं है प्रेम

कि चखा और छिड़क दिया

सिर माथे पर लगाकर

पहले खुद की ख़ुशी भूले

जीना पड़ता है उसके लिए

सब कुछ भुला कर 

प्रेम करने से पहले जरा सच्चे इंसान होले...

सीमा असीम

12,1,21


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