गुनगुना रहे हैं गीत अकेले ही बैठकर किसी मूरत के सामने ही बैठकर कि नदीं उफान पर है आजकल लहरों को गिन रहे हैं वहीं बैठकर || सीमा असीम 24 ,12,25 नहीं नहीं अब मुझे यह बच्चा नहीं चाहिए कुछ करो कुछ भी करो लेकिन अब मैं इसका पालन पोषण नहीं कर सकती देखभाल नहीं कर सकती तो पैदा क्यों करूं अब मेरा मन तो पूजा पाठ में राम गया है मैंने तो व्रत मन कर लिया है संसार से मेरे बच्चे बड़े हो गए मेरे दो बच्चों की शादी हो गई अब मैं इस उम्र में मैन बनूंगी कैसा लगेगा नहीं मुझे यह बच्चा नहीं चाहिए वह एकदम से चीख पड़ी थी लेकिन ईश्वर के आगे कभी किसी की चली है भला जो ईश्वर को मंजूर होता है वही होता है जिसको इस दुनिया में भेजना होता है वह किसी तरह से आ ही जाता है किसी की भी कोख से पैदा हो जाता है और जिसको नहीं आना होता है वह कोख में ही खत्म हो जाता है इस दुनिया का मुंह नहीं देख पता ऐसा ही उसके साथ हुआ था लाख चेतन किए लाख दवाइयां खाई लाख उपाय आजमाए लेकिन इस बच्चे को मेरी कोख में आना है मेरी कोख से ही पैदा होना है तो अब क्या करें वह डॉक्टर के पास गए तुम इस बच्चे को ...
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Showing posts from December, 2025
चाह
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चाहत तो बस इतनी सी है कि जिंदगी में हमारी भरपूर खुशियां ही खुशियां हो प्राकृतिक वातावरण का माहौल हमारे आसपास हो बहुत सारा प्यार हो और तुम्हारा साथ हो एक खूबसूरत सा महल जैसा घर हो इसमें हमारा एक नया संसार हो दर्द का ना हो नाम तो निशान जरा सा भी बस खुशी और सुख की बस बौछार हो मैं बना लूं खुद को एक बहुत बेहतर इंसान और मेरी आत्मा एकदम पवित्र हो मेरे चेहरे से झलके मेरी मासूमियत मेरे मन में इतनी ज्यादा पारदर्शिता हो हमारी सारी चाहते पूरी हो जाए और सारे सपने हो पूरे बस इतनी सी तो ख्वाहिश है जीवन में वह सब मिल जाए इसके लिए हम हकदार हैं एक सुंदर सा महल हो सपने जैसा और उसमें हो प्रेम ढेर सारा अपनों का साथ हो और भरपूर अपनापन हो बस इतनी सी ही तो चाहत है जैसे भी हो बस पूरी हो जाए कैसे भी करके इच्छाएं हमारी पूरी हो जाए क्षितिज के पार जाने की जो चाहत है आसमान को छूने की जो चाहत है वह पल भर में पूरी हो जाए जैसा चाहूं जैसा सोचूँ बस वैसा होता जाए अपने आप से सारे रास्ते ...
धैर्य
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धैर्य एक ऐसा शब्द जो आपको कभी भी निराश नहीं होने देता अगर आप धैर्य का दामन थाम लेते हैं तो आप कभी भी परेशान नहीं हो सकते क्योंकि धैर्य हमें सिखाता है अपने सपनों को जीने का तरीका क्योंकि अगर हम धैर्य के साथ काम करते हैं तो हम अपने सपनों को जीते रहते हैं अगर हमारे पास सपने नहीं होंगे तो जीवन क्या होगा.. ऐसा जीवन किस काम का होगा.. मेरे ख्याल से जैसे कोई पक्षी होता है तो उसके पंख टूट जाते हैं तो वह आसमान में अपनी ऊंची उड़ान कभी नहीं भर सकता इसलिए जीवन में सपनों का होना बहुत जरूरी है जब सपने नहीं होते हैं या फिर हम सपनों को छोड़ देते हैं या सपनों को भूल जाते हैं तो जीवन किसी बर्फ के सामान जमा हुआ लगता है जिसमें कोई गरमाहट नहीं जैसे कोई बंजर सा मैदान बन जाता है जिसमें नहीं उगते कोई फूल.. टूटे हुए पंखों वाला पक्षी कभी आसमान में उड़ा सकता है नहीं न.. तो हमें अपने सपनों को धैर्य के साथ थामें रहना चाहिए पकड़े रहना चाहिए तब तक जब तक है जीवन जब तक है दुनिया और जब तक है हम!!!! सीमा असीम सक्सेना 20,12,25
क्यों छोड़ा, क्यों तोड़ा रूह को
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क्या तुम जानते हो या तुम्हें पता है कि तुमने किस तरह हमारा त्याग कर दिया था जिस दिन तुम्हारी आत्मा ने मेरी आत्मा को किसी एक दूसरी आत्मा के लिए त्याग किया था उस दिन काँप उठी थी धरती,नदियों में बाढ़ आ गई थी, धरती घबराकर हिलने लगी थी क्या तुम्हें पता है जिस दिन तुमने मुझसे प्रेम किया था उसे दिन दुनिया बहुत खूबसूरत हो गई थी फूलों की खुशबू से सराबोर हो गई थी, मैं मौन थी चुप थी खामोश थी फिर भी हमारा प्रेम बहुत गहरा होता चला जा रहा था बहुत ही गहरा मानो हमारी आत्माएं एक दूसरे से बांध गई थी लेकिन तुमने बंधी हुई दोनों आत्माओं को मेरी और तुम्हारी आत्मा को अलग किया किसी दूसरी आत्मा से रिश्ता जोड़ने के लिए क्या तुमने कभी सोचा नहीं क्या तुम्हारे मन में एक ख्याल भी नहीं आया कि तुमने ऐसा कैसे किया किसी आत्मा को कष्ट देना कितना बड़ा पाप है मेरी रूह तुम्हारे लिए हर समय आवाज लगाती थी अभी भी आवाज लगाती है अभी भी तड़प होती है व्याकुल होकर मैं तुम्हें ढूंढती फिरती हू...
वो वक़्त जो...
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यूं ही कभी-कभी मन परेशान हो जाता है ना जाने क्यों इतना बेकरार हुआ जाता है जुबाँ पर चलता रहता है कोई नाम बार-बार क्यों यह मेरा दिल तार तार हुआ जाता है.. ऐसा ही होता है ना कभी-कभी, मन पता नहीं क्यों इतना परेशान होता है ना जाने क्यों, पुराने से ख्यालों में खो जाता है और वही सब बातें बार-बार याद करता है जो पल गुजर गए, जो दिन बीत गए, जो वक्त निकल गया उसी वक्त में उस पल में उन्हीं दिनों में मन बार-बार लौट जाने को करता है, पता नहीं क्यों ऐसा होता है अक्सर, मुझे लगता है हर किसी के साथ ही होता होगा गुजरे हुए दिन,पल, वक्त, समय कहां भुलाया जा सकता है किसी से, कोई भी नहीं भूल पाता है वह बीते हुए, गुजरे हुए जमाने आंखों के सामने गुजरते हैं, बार-बार याद आते हैं वही खूबसूरत हसीन पल और दिन, जब जीवन में बहुत सारी खुशियां थी बहुत सारा प्यार था और बहुत स्नेह अपनापन सब कुछ तो था. हाथों में हाथ था और नजर के सामने था सब कुछ, वैसे नजरों से ओझल होकर भी तो वो ओझल नहीं हुआ क्योंकि वह कहीं दिल में समा गया है,आंखों में बस गया है और रूह में उतर गया है,.. वह दिन वह पल ...
आलस्य
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कभी-कभी कुछ करने का बिल्कुल मन ही नहीं करता, न लिखने का मन, न पढ़ने का मन और न ही घर के किसी भी काम को करने का मन..ल गता है मानो पूरे शरीर में आलस्य आ गया है और यह आलस्य कितना अच्छा लगता है, आराम से लेटे रहना, कुछ नहीं करना मतलब कुछ भी नहीं करना लेकिन तभी मुझे याद आते हैं.. अपने बहुत सारे वे कार्य जो अधूरे है और कुछ नए कार्य भी हैं जिन्हें पूरा करना है शुरू करना है.. इसके लिए मुझे इस आलस्य का त्याग करना होगा,छोड़ देना होगा आराम को हालांकि आलस्य इतना आनंददायक होता है कि इससे ज्यादा आनंद तो किसी मनपसंद फिल्म को देखने में भी नहीं आता.. वैसे आराम से बैठकर, लेट कर कल्पनाओं में बिचरना, खुली खुली आँखों से सुंदर-सुंदर सपने देखना, बस यूँ सोचते रहना.. तभी खिड़की से नजर पड़ जाती है सामने खिले हुए फूलों की तरफ,पेड़ों की तरफ, पौधों की तरफ... कितने आनंद के साथ साथ पत्ते हवा के साथ झूम रहे हैं मानो मदमस्त हो गये हैं और यह फूल कितने सुंदर हैं जो अपनी पूरी सुंदरता के साथ मनमोहक खुशबू बिखेर रहे हैं चारों तरफ.. यह तो नहीं आलस करते कभी भी..तभी तो यह झूम रहे हैं मज़े से और सबको खुशियाँ दे रहे हैं.. चलो छ...
बचपना
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मुझे अच्छा लगता है छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेलना उनसे बातें करना और उनकी बातों को सुनना कितनी प्यारी प्यारी बातें करते हैं छोटे बच्चे और उनके अंदर इतना प्रेम भरा होता है कि आप उन्हें थोड़ा सा भी प्रेम देते हो तो वह उसका 10 गुना प्रेम लौटाते हैं इसलिए तो मुझे बच्चे बहुत प्यारे लगते हैं क्योंकि उनके अंदर और उनके मन में सिर्फ प्रेम का भाव होता है नफरत की भावना नहीं उनके साथ खेलना उनके साथ दौड़ना भागना वह सब करनाजो छोटे बच्चे करते हैं.. क्या मैं छोटी बच्ची हूं छोटी बच्ची तो नहीं हूं लेकिन मेरा मन छोटे बच्चों जैसा है मैं अपने मन को हमेशा छोटे बच्चे जैसा ही क्यों महसूस करती हूं मैं बड़ी क्यों नहीं होती मैं देखती हूं लोगों को अपनी उम्र की महिलाओं को कितनी बड़ी-बड़ी बातें करती है कैसे घर गृहस्ती पर बच्चे और न जाने कहाँ कहां की दुनिया भर की बातें.. यह सब बातें मेरे मन में क्यों नहीं आती है अक्सर मैं इसी ख्यालों में रहती हूं यही सब सोचते हैं कि मुझे क्यों नहीं आती दुनियादारी मैं क्यों अभी भी बचपन में जीती हूं क्यों अपने आप को अभी भी बच्चा समझती हूं ना जाने क्यो...
जंगल
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कभी किसी गहन सुनसान जंगल से गुजरते हुए अक्सर मेरे मन में एक ख्याल आता है कि इतना सूनापन सन्नाटा क्यों है इस जंगल में क्योंकि यहां भी तो रहते हैं जीव जंतु और पक्षी उनकी भी तो आवाज होती है और उनका भी तो कोलाहल फिर क्यों इतना वीरानापन फिर सोचती हूँ यह दुनिया जो इंसानों की है वहां इतना शोर शराबा और इतनी आवाज़ है कहीं कोई शांति नहीं कोई सको नहीं सिर्फ शोर आवाज़ और कोलाहल फिर भी कभी-कभी मुझे महसूस होता है कि इन सबके बाबजूद हर इंसान के अंदर इतना ही गहरा सन्नाटा है इतना ही सुन्नपन है और इतना ही वीरानापन है भले ही वह लाख सुख सुविधाओं और खुशियों के बीच क्यों न रह रहा हो है लेकिन सही बात तो यह है कि हर इंसान के अंदर एक जंगल की तरह ही वीराना है सुनापन है और सन्नाटा है सीमा असीम सक्सेना 9,12 25
ख्वाहिश
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मैं अपने पंखों को प्रसार कर उस संसार को देखना चाहती हूं जहां खिली खिली धूप हरदम रहती है जहां पर हरियाली अपना बसेरा बसाये है खुला खुला नीला आसमान है और फूल ऐसे चारों तरफ खिले रहते हैं रंग तो इतने खूबसूरत कि देखने का मन करता रहता है मन भरता ही नहीं कभी... मैं उस खूबसूरत संसार को देखना चाहती हूं जहां पर मैं अपने पर सकूँ के साथ रह सकूं या अपना खूबसूरत सा संसार बसा सकूं.. जहां पर हो प्रेम अपनापन और सिर्फ खुशियां ही खुशियां हो मुस्कुराते हुए मन के साथ अपने मन के अंधेरे को मिटा कर रोशनी से भर लेना चाहती हूं.. बहुत दिन हुए उदासियों के बादलों से घिरे हुए मेरे मन को अब उसे एक खुला आसमान देना चाहती हूं और एक इतनी ऊंची उड़ान भरना चाहती हूँ ताकि उस ताजी हवा को महसूस कर सकूं जी सकूं. जीवन को पूरे आनंद सेभरकर खुश रहूँ और खुशियां भी बाँट सकूं.. उन छोटे-छोटे बच्चों के साथ उनके बच्चों के जैसे ही होकर खिल खिला कर जोर से हंसो और दौड़ लगाऊं इतनी तेज कि उन बच्चों की कुलाची भरती हुई दौड़ को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाऊं आगे आगे ही आगे... बस एक ख्वाहिश तो है और यह ख्वाहिश पूरी होने को है जल...
तेरा नाम
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क्यों यूँ जो तेरा नाम मेरी जुबाँ पर बार-बार आता है सुबह ओ शाम हर पल हर क्षण जो बार बार आता है क्या हवाओं से तू पैगाम भेजता रहता है या फिर फ़िजाओं से तू बात करता रहता है कि तेरी खुशबू मेरे चारों तरफ बिखर जाती है लबों पे ही तेरी बात हर बार आती है मेरे जेहन में तू हर समय भटकता रहता है क्या अब तुझे कोई और कम नहीं रहता है मेरा बायां अंग इस तरह से फड़कता है कि मुझे मुस्कुराने को मजबूर कर देता है हिचकियों में कभी आराम नहीं आता है बस तू यह बता कि मुझे इस तरह से क्यों परेशान करता है क्या मुझे यादों में हर समय बसाए रखता है या तू हर वक्त माला में बस मेरा नाम जपा करता है बता कुछ तो जवाब दे किसी तरह से मुझे इस तरह से हवाओं से फिजाओं से ना तू मुझ तक अपनी बात को पहुंचा बेकरार करके इस तरह क्या तुझे चैन आएगा मैं तो गुम होकर तेरी याद में फिर कहीं तुझे ही बावरा ना बन जाऊं... सीमा असीम 6,12, 25
जहाज
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जहाज उतर गया है समुद्र में और भरने लगा है उसमें सामान, जहाज में भरा जा रहा है विदेश भेजने के लिए बहुत सारा सामान यह सामान बेचने वाला जहाज है जो जाने वाले लोग हैं वह भी जाना चाहते हैं समुद्री जहाज में बैठकर समुद्र की यात्रा करना चाहते हैं दूर देश तक, पानी के ऊपर चलते हुए वह चलते चले जाना चाहते हैं उस देश में जो उनकी कल्पनाओं में है, इसकी उन्होंने कल्पनाएं बचपन से अपने मन में संजो के रखी थी दूर देश जाना हवाओं में उड़ जाना या पानी में तैरते हुए पहुंच जाना क्योंकि जीवन को जीने का यही तो तरीका है अगर हम जीना चाहते हैं तो हमें दूर तक का सोचना पड़ता है दूर तक की कल्पनाओं तक उड़ान भरनी होती है तो पानी के जहाज हमारी उस कल्पना को पूरी करने के लिए हमें अपने साथ लिए चले जाते हैं दूर देश इतने प्यारे देश में जहां पर खूब सारी खुशियां होती हैं और खूब सारे सुख होते हैं एक मस्त परिंदे की तरह मन और ऊंची उड़ान भरने लगता है तो जहाज तैयार है सामान से भी लदें हैं और इंसान से भी अपने जहाज में बैठकर जो इंसानों का है दूर देश की यात्रा को निकाल रहे हैं ...
रंग
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रंग कितने प्यारे होते हैं जब कभी देखो रंग-बिरंगे कोई चित्र कोई आकृति तो मन करता है कि बस देखते ही रहो चाहे वह फूलों के रंग हो या फिर रंग रंग-बिरंगे रंग कलर जो हमारे चित्र बना देते हैं सुंदर-सुंदर तभी इन रंगों को देखकर हमें याद आ जाती है अपने बचपन की कि हम कैसे खेला करते थे अपने रंगों से अपने सुंदर-सुंदर चित्र बनाते थे अगर हमारे पास सुरंग की नहीं होते थे तो हम मिट्टी लेते थे तो उसको हल्दी में मिलाकर पीला रंग बना लेते थे और ईंट होती है ना जो मकान बना देती हैं घर बना देती है उसे उठाकर हम लाल रंग बनाते थे गेरुआ रंग बनाते थे और जहाँ कहीं भी जगह मिलती तो उससे हम दीवार पर चित्र बना देते थे जो कहीं खाली दीवार दिखती थी हालांकि मेरी उसे वजह से डांट भी पड़ती थी लेकिन क्या करें रंगों से प्यार ही इतना है बचपन से लेकर आज तक सच में मुझे रंग बहुत प्यारे लगते हैं जब बड़े हुए तो हमारे जीवन में कितने सारे रंग आ गए बचपन में तो प्रेम का रंग होता ही है मां-बाप का प्यार लड़ दुलार सब कुछ लेकिन जब हम युवा ...