चलो मां मैं कल चली ही जाती हूं जब भी तो इतना कह रही है आज आप फिर इतने दिनों के बाद हमारा संग साथ होगा तो अच्छा लगेगा लेकिन एक बात सुनो मैं पैकिंग तो कर लेती हूं 2 दिन का प्रोग्राम है पर आप कुछ खाली मैं परेशान नहीं होगी और कुछ बनाएंगे नहीं जाकर हमेशा किचन में खड़ी रहती हैं कुछ ना कुछ बनाने के लिए आशियाने खुश होकर मां से बात हुई थी ना जाने कितने दिनों के बाद उसके मन को थोड़ा सा सुकून से आया था कहीं जाने में बाहर निकलने में लोगों से मिलने के बाद मन तो अच्छा होता ही है और जब विचार ही आया जाने का तभी इतना अच्छा लग रहा है
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Showing posts from October, 2022
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जी चाहता है सारी दुनिया में ले आऊं तबाही भोले बाबा की तरह अपना तीसरा नेत्र खोल दूँ इतना घबराता है जी कभी-कभी कितना भी रो लूँ पूरा नहीं होता कुछ भी करने को दिल चाहता है पूरी दुनिया से पानी पानी सिर्फ पानी सिर्फ पानी भर देने को जी चाहता है पूछना चाहती हूं मैं ईश्वर से एक बार मिलकर अगर तूने दुनिया बनाई है यह दूनिया तो तूने अच्छे इंसान नहीं बनाये कुछ तो आंखों में इंसान की शर्म दी होती कुछ तो आंखों में दर्द दिया होता छल कपट प्रपंच रचने के अलावा कुछ तो इंसानों के अंदर इंसानियत होती ईश्वर मैं तो सिर्फ यह पूछना चाहती हूं सिर्फ कि तूने मुझे इतने दुख क्यों दिये कि मेरी आंखों के आंसू थमते नहीं हैं असीम
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कहाँ हो आर्यन तुम और बिना बताए कहां चले गए चंपारण वापस आ जाओ वरना मैं मर जाऊंगीमेसेज करने के बाद मन को थोड़ा सकून आया कि अब उसका आर्यन वापस आ जायेगा क्योंकि यह पढ़ने के बाद वो मेरी स्थिति समझ जायेगा उसी समय उसका फोन की घंटी बज उठी है और वह अपनी तरह से तुमचा से बाहर निकल आई है क्योंकि वह तुम्हारे ख्यालों में खोई हुई थी उसका फोन तो नहीं है किसका फोन है वह जल्दी से फोन का बटन दबा कर बात करने लगी कल तू आ रही है सैया हम लोगों को सुबह जल्दी निकलना है भाई और हम और तुम तीनों चल रहे हैं वहां पर हम लोग बहुत मजे करेंगे कितने दिनों के बाद साथ जाने का मौका मिला है और तू ऐसा कैसे कर सकती है कि ना जाए तो जा रही है हमारे साथ हर हाल में कोई बहाना नहीं चलेगा बड़े दिनों के बाद तो हाथ लगी है और तेरा साथ मतलब खुशियों का भंडार तो तू जहां भी रहती है बस खुशियां ही खुशियां होती है लेख लेकिन तुम मुझे अब पहले जैसी नहीं लगी तो कल बड़ी उदास निराश और हताश थी क्या हुआ है तो मुझे बताना मैं तो तेरी ही हूं तेरी सहेली तेरी अपनी तेरी सब कुछ हां हां यार मैं सब पता होगी तो इतनी सारी बातें करेगी ए...
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na जाने क्यों आदत सी हो गयी है हर किसी को हर बात पर शक सुबह करने की लोग तो अक्सर इश्वर पर भी शक करने लगते हैं समझते ही नहीं कि जो इश्वर करता है या कर रहा है वो हमारे भले के लिए ही कर रहा है जो कुछ भी वो करता है उसमें हमारा कुछ न कुछ अच्छा ही हो रहा होता है की भी हमारे साथ अगर कुछ भी गलत करता है तो उसका अंजाम उसे खुद ब खुद जरुर मिलता है तो फिर हम क्यों उस पर ऊँगली उठाते है क्यों उसे गलत ठहराने के लिए कमर कस लेते हैं और हर तरह से नीचा दिखने का प्रयास करते हैं उसके लिए हमें चाहें कितने भी साम भेड़ क्यों न अपनाने पड़े आखिर उसे गलत साबित कर देते हैं तभी सकूं पाते हैं जबकि जो गलत करता है वो खुद ही उसकी सजा भुगत रहा होता है अपने मन ही मन में हमें तो विश्वास रखना है सिर्फ खुद पर और अपने इश्वर पर फिर चाहें कोई कुछ करे हमें कोई भी फर्क नहीं पड़ने वाला है हमें मस्त रहना है खुश रहना है बहुत हुआ अब जियो शान से और दिखा दो दुनिया को कि हमारे साथ ईश्वर है वो...
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कभी-कभी हम मजबूर होते हैं बेइंतिहा मजबूर होते हैं हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते लेकिन हम भले ही कुछ नहीं कर पाते या नहीं कर रहे होते हैं पर हमारा ईश्वर जो सब देख रहा होता है वो अंदर ही अंदर हमारे भले के लिए कर रहा होता है जैसा हम चाहते हैं उससे भी कहीं ज्यादा एक सुंदर संसार रच रहा होता है और जब ईश्वर करता है न तो फ़िर सारी दूनिया सिर्फ भौचक होकर देखती रह जाती है.. क्योंकि तुम किसी की सरलता का फायदा उठा कर उसे यूँ फेंक देते हो न उस वक्त ईश्वर अपनी बाँहों का सहारा दे देते हैं और हर तरह से संभाल लेते हैं... सीमा असीम
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हे ईश्वर देखो ना कितनी बारिश हो रही है आसमान से और उतनी ही बरसात हो रही है मेरी आँखों से मैं अकुला जाती हूं घबरा जाती हुँ सोते से जगकर बैठ जाती हुँ ढूंढने लगती हूं तुम्हें यहां वहाँ जहां-तहां कितनी पागल हो ना मैं मूर्ख हूं पूरी की पूरी जब रहते हो मेरे मन में तुम और तुम्हारे मन में मैं तो क्यों ढूंढने लगती हूं तुम्हें कहीं भी किधर भी... सीमा असीम
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मैं रहती हूं तुम्हारे दिल में नहीं जा पाती हुँ पल भर को भी दूर कहीं तुम से जहां तुम वहाँ मैं और जहाँ मैं वहाँ तुम संग संग रहती हूं मैं सदा तुम्हारे जब तुम साँस लेते हो ना तभी मैं सांस लेती हूं जब तुम हंसते हो तब मैं हँसती हुँ और जब तुम रोते हो तो संग संग रो देती हुँ मैं तुम्हारे खाते पीते सोते जागते हरदम तो तुम्हारे साथ रहती हूं बताओ भला दिल से भी किसी को कहीं निकाला जा सकता है क्या कभी नहीं ना, कभी भी नहीं यह तो संभव ही नहीं है कि जुदा हो सके मेरी आत्मा से कभी तुम्हारी आत्मा... सीमा असीम
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हां मैं तुम्हारा इंतजार करती हूं हर पल में हर क्षण में अपनी हर आती-जाती सांस के साथ मैं तुम्हारा नाम लेती हूं हां मैं जानती हूं कि तुम मेरे हो सिर्फ मेरे ही तभी तो मैंने तुम्हें जाने दिया बहुत दूर तक जाने के लिए मैंने बहुत बड़ी ढील दे दी तुम्हें लेकिन सुनो तुम कहीं जाकर भी तो नहीं जा पाए तुम जा नहीं सकते कहीं क्योंकि तुम तो सदा वही हो जहां मैं हूं यहां जहां मेरी सांसे हैं और जहां मेरी आत्मा है हां तुम्हारी उड़ान बस उतनी ही तो है जहां तक मेरी आत्मा जाती है फिर भी मैं करती रहती हूं तुम्हारा इंतजार हर पल हर क्षण ना जाने क्यों ना जाने क्यों... सीमा असीम
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सजानी थी मुस्कान मेरे चेहरे पर पर तूने मेरी आँख में आंसू भर दिए इतने गम ही गम दिये और जिस्म में जख्म भर दिये तुझे क्यों खयाल ही नहीं आया एक बार भी मेरा मैंने तो दी थी तुझे हमेशा खुशी ही ख़ुशी और तुमने मुझे दर्द दे दिए तड़प जाती है दर्द से रूह मेरी आत्मा तक, तूने इतने घाव दे दिये तुझे तो समझा था मैंने सिर्फ अपना ही अपनेपन के बदले तूने मुझे ऐसे कैसे सिले दे दिए काश कि तेरे जिस्म में होता एक मासूम सा प्यारा दिल भी तो दिमाग से ही न सोचता, सोचता कभी दिल से भी न करता हर जगह दिमाग का ही प्रयोग तो आज मेरी आंखों में आंसू ना होते और मेरे चेहरे पर मुस्कान सजी होती क्योंकि मुझे मिलता प्रेम के बदले प्रेम अपने पन के बदले में अपना पन त्याग के बदले में त्याग और समर्पण के बदले में समर्पण कोई बात नहीं वक्त तो सबका आता है वक्त कहां ठहरता है भला, वक्त कभी कहीं नहीं रुकता है वो तो चलता ही रहता है अपनी रफ्तार से और जो आज तू कर रहा है मेरे साथ कल को तेरे साथ भी शायद यहीं होगा तू भी तड़पेगा रोएगा और तेरी...
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कुछ इंसान अपने चेहरे पर ना जाने कितने चेहरे लगाए रहते हैं समझ में नहीं आता कि उसका असली चेहरा कौन सा है हां मुझे लगता है तुम भी तो ऐसे ही हो क्या मैं सच हुँ या गलत ? क्या मैं सही हूं यह मैं झूठ ? अगर मैं सही हूं तो मैं तुम्हारे चेहरे को इतना देर से कैसे पहचान सकी ? वैसे मुझे तो पहले ही समझ आ गया था लेकिन वह कहते हैं ना कि झूठे को अंत तक पहुंच जाना चाहिए ! हां मैं अंत तक पहुंचाना चाहती थी मैं देखना चाहती थी अंजाम! हां इसमें बहुत सारे दुख थे, कष्ट थे, तब भी मुझे खुशी है कि मैं तुम्हें पहचान तो सकी, तुम्हें पहचानना खुद को पहचानना नहीं था ! वह तो सिर्फ तुम्हें पहचाना था ! खुद को पहचानने के लिए मैं खुद में उतरी और आज मैंने खुद को पहचान भी लिया कि मैं सच हूं और हमेशा सच ही रहूंगी और मेरा मन हमेशा सच्चा पवित्र ! इसे कोई भी नहीं झुठला सकता इसे कोई भी नहीं खत्म कर सकता ! मैं सच्ची हूं और सच्ची ही रहूंगी.... निर्मल पवित्र आत्मा से मनन चिंतन और लगन लगाए रहूंगी... हो जैसे भी हो तो आखिर मेरे ही, हां सिर्फ मेरे... असीम