तुम्हें चाहूँ तुम्हें पूजूँ और तुम्हें ही प्यार करूँ 
अय सनम तेरे लिए तो जां भी निसार करूँ !!
सुनो प्रिय , 
आज का दिन अच्छा बीत गया, बस नींद आयी तो  तुम्हारा ख्याल आया और ना जाने क्यों  दिल घबराने लगा फिर नींद नहीं आयी ,  सनम  यह मेरा प्रेम ही  तो है जो मुझे एक पाँव से नाचने को मजबूर कर देता है घुमाता रहता है चकरघिन्नी की तरह ,!! जैसे घूमती रहती है   पृथ्वी गोल गोल, ऐसे ही मेरा मन भी तुम्हारे चारो और परिक्रमा करता रहता है और मन ही मन तुम्हारा नाम जपता रहता है जैसे कोई मंत्रोचार हो रहा हो ,!
      सोचने लगती हूँ कि तुम्हें न जाने कब मिल पाऊँगी, न जाने कब तुमसे दिल की बात कह पाऊँगी,!
 नहीं जानती मैं बस इतना पता है कि तुम्हें मैं अपने मन से पल भर को भी दूर नहीं कर सकती हूँ और जब जरा किसी अन्य काम में व्यस्त हो जाती हूँ तभी अचानक से दिल घबरा जाता है और मैं  बेक़रार हो जाती हूँ ! न जाने यह प्रेम का कौन सा रूप है,  या कौन सी चाह है यह सब जानने  में असफल हूँ मैं ,सच में असफल ! 
      जी चाहता है कि अभी भागकर जाऊं और तुम्हारे गले से लगकर अपने मन की सब बातें कह आऊं ,कह आऊं तुमसे कि नहीं जिया जा रहा है तुम्हारे बिना या तुमसे दूर होकर ,सनम मेरे मन के मीत , ओ मेरे माही। ....  आओ कि सोहनी की पुकार सुन लो , सुन लो और उसे जीवन दे दो कि उसने मरने की ठान ली है अब , सोच लिया है कि मर जाना ही बेहतर है तुमसे दूर रहकर जीने से , मैं अपनी दोनों बाहें फैला कर रब से दुआ मांगती हूँ तुम आओ , और देखो मेरे दिल में तुम्हारे लिए सच्चा प्रेम है या नहीं है ! वैसे मुझे हमेशा यही महसूस होता है कि तुम भी मुझे बेइंतिहां प्रेम करते हो तभी तो एक आवाज पर सामने नजर आने  लगते हो , भले ही हम मिल नहीं पाते हैं पर ख्वाबों में ख्यालों में हमेशा साथ ही  रहते हैं ,,,,
यह रूह का रिश्ता है इसे भला कोई कैसे  कर पायेगा दूर 
जब रूह रूह से आपस में जकड के उलझ गयी हैं। ... 

सीमा असीम 
९,६,१९ 

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