सोचती हूँ तुम्हें बस सोचती रह जाती हूँ
कि प्रेम करती हूँ मैं तुम्हें जान से जयादा !
सुनो प्रिय
              यह सच है कि तुम सिर्फ मेरे हो लेकिन सनम यह मेरे दिल को क्या हो जाता है क्यों मन में गलतफहमियां   पल जाती है फिर चाहें तुम मुझे लाख समझा दो या मैं खुद ही अपने मन को समझा दूँ दिल समझता  ही नहीं है ,,,आज जब तुमसे बात की तो लगा  कि  हमारे मन में तो तुम्हारे लिए सिर्फ प्रेम है और कुछ भी नहीं मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ प्रिय जैसी भी हूँ या जो कुछ भी हूँ सिर्फ तुम्हारी , हाँ इतना  कि मैं एकदम से सच्चे मन से ही हमारा  निभाऊंगी , हर कष्ट को अकेले  सह कर भी अब तुमसे  कोई शिकवा या शिकायत  करुँगी क्योंकि  हूँ कि तुम मेरे हो सिर्फ मेरे  और रहोगे भी, पता है   प्रिय ऐसा लगता है मुझे कि   मेरी आँखों में कोई नदी बस गयी है जो जब देखो तब   बह जाने को आतुर  जाती  है  जो मेरे लाख कोशिश करने पर भी रूकती या थमती नहीं है। ...न जाने  कहाँ से आ जाता है इन मेरी आँखों में , पानी
      आज जब तुम  बातें करते हुए मुझे समझा  रहे थे   तभी मैंने निर्णय कर लिया था अब चाहें कुछ भी हो मैं गुस्सा नहीं करुँगी ,प्रिय तुम्हें तो मैंने  प्रेम किया अपनी आँखों में पुतली की तरह रखा है , जब आँखों में आंसू बहते हैं तो  दुःख होता जरूर होगा ,,,
अब   मैंने भी लगा दी सनम तेरे दिल में अर्जी
तू चाहें तू दुःख दे या  सुख दे सब तेरी मर्जी !!
सीमा  असीम
९,६ , १९ 

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