आज वट सावित्री की पूजा है मुझे खूब अच्छी तरह से याद है कि तुम्हारे लिए मैंने व्रत रखा था पूजा की थी और तुम्हारे टीका लगाकर तुम्हारे पैर छूकर तुम्हारा आशीर्वाद लिया था कहाँ पता था मुझे जिस पर अपना तन मन धन सब हार बैठी हूँ वही शख्श मुझे बर्बाद कर देगा सिर्फ अपनी ख़ुशी की खातिर ,,ओह्ह्ह यह दर्द और यह कष्ट तुम किस तरह से मुझे दे पाए ,,,तुम्हारी नजरों के सामने मेरा चेहरा नहीं आया ,,,मुझे पता है इस दुनिया में न तो ईश्वर है न उसकी कोई शक्ति अगर होती तो तुम अपना धर्म निभाते अपने फर्ज के लिए कुर्बान हो जाते ,,वो प्यारा दिन था सुबह से ही मेरे मन में बेहद श्रद्धा थी मैं आज तुम्हारे लिए व्रत रखने वाली थी बिना पानी पिए ही रखना था ,मेरे मन में कितनी आस्था और प्रेम था जो मैं सब तुम्हारे लिए न्योछाबर का देना चाहती थी उसके लिए जो मुझे पल पल छल रहा था, जो झूठ और दिखावे की शक्ल का लावड़ा ओढ़े हुए वो इंसान अपनी फितरत छुपाये हुए था एक खोल में ,,,हालाँकि मेरे पास पूजन की इतनी चीजें नहीं थी फिर भी मन में पूरा समर्पण भाव था ,,,,मैंने पूजा कर के जब तुम्हें प्रसाद खिलाया तब मुझे लगा कि दुनिया में सचमुच ईश्वर है उसकी शक्ति है लेकिन मैं गलत समझ रही थी प्रिय मुझे बस इतना बता दो सच्चे प्रेम का क्या है यही न जो तुमने मुझे समझाया। ..... क्या कहूं अब मैं तुमसे और कितना कि दिल को किसी भी तरह से न राहत मिलती है न तसल्ली आती है। ......
मुस्कुराना
कितना अच्छा लगता है सुबह सुबह सूरज का निकलना पंछियों का चहकना फूलों का खिलना और रोशनी का बिखर जाना रात के अंधेरे को मिटाते हुए जब रोशनी होती है तो मन खुशी से प्रफुल्लित होता है बहुत अच्छा लगता है मुझे दुनिया को रोशनी में देखना मुझे नहीं पसंद अंधेरा नहीं पसंद मुझे मुरझाना नहीं पसंद मुझे रोशनी का कम हो जाना लेकिन सुनो इस सब से भी ज्यादा अच्छा लगता है मुझे तुम्हारा मुस्कुराना तुम्हारा मुझ से बतियाना....... सीमा असीम 3, 10, 20
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