यही सच है कि एक दिन हर तरफ फूल ही फूल खिल जाएंगे
आँखों से बहाये हैं सनम अश्क मैंने इतने ज्यादा ,
सुनो प्रिय
             आँखों ने बहने वाले आंसुओं का कभी तो सिला मिलेगा जरूर कि  दिल इतना भारी और दर्द से भर दिया है तुमने मेरा मैं तुम्हें चीख कर अपनी आत्मा से आवाज लगाती हूँ लेकिन यह आवाज कहीं बीच में ही घुटकर दम तोड़ देती है और तुम्हारे पास तक नहीं जाती जितनी जोर से भी आवाज लगाऊं दिल का लहुं आखों से बहा दूँ कोई भी सदा तुम तक जाती नहीं है तभी तो तुम कभी मुझे याद नहीं करते ,,सनम तुम भी मेरे जैसे ही मुझे चाहते ,मेरे जैसे ही मुझे प्रेम करते मेरे जैसे ही मेरा इन्तजार करते तो शायद तुम्हें मेरा ख्याल आता , तुम्हारे  दिल में एक बार मेरे लिए दर्द  होता ,तुम भी यूँ ही तड़प तड़प कर मचल मचल जाते ,जमीं पर लोट लगते या शावर के नीचे घंटो खड़े हो  जाते फिर भी दिल की अगन काम नहीं होती किसी भी तरह तुम्हें सकूँ या करार न आता , बेजान जिस्म काम करता रहता और आत्मा दर्द के सागर में डूब जाती तब तुम्हे पता चलता कि प्रेम क्या होता है या उसका दर्द क्या होता है , सनम बस एक बार जो मुझ पर बीत रही है उसका तुम्हें बस अहसास हो जाए तब मैं समझूंगी कि मैंने तुम्हें सच्चे दिल से चाहा था शायद ऐसा होगा जरूर ,,,,,हाँ सनम जरूर होगा देखना तुम मेरी राहों में सिर्फ फूल ही फूल होंगे ये काँटों की चुभन ख़त्म हो जायेगी अश्कों से भरी आँखों में होगी ख़ुशी ही ख़ुशी गम की दिवार ढह जायेगी ,,मैं याद करती हूँ तुम्हारी कही एक एक बात ,तुम्हारे साथ बिताये एक एक पल को तब याद आता है कि तुम किस तरह से नजर चुराते थे किस तरह से बातें करते थे ,जो दर्जा तुमने मुझे दिया क्या उसका कभी मान रख पाए कभी सच रह पाए उफ्फ्फ तुम्हें कुछ भी कहना खुद को गलत कहना हैं ,,,एक दिन सब अच्छा हो जाए वही बहार हमारे क़दमों में हो
प्रेम का सागर मेरे आसपास उमड़ आये
माना कि देर है पर अंधेर नहीं
रब की अदालत में
वो रब मेरे दर पर खुशियों की पौध ऊगा जाए
तब आये तुम्हें समझ और हो अपनी गलती का अहसास
कि किस तरह हमने ये दर्द भरे दिन बिताये ,,,,
सीमा असीम
१,६,१९ 

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