मैं लिख देती हूँ अपनी  ही तकदीर अपने ही हाथों से
अय सनम तुझे मैं रज रज के रचती हूँ हीरे की तरह
सुनो सनम
        आज बड़े दिनों के बाद तुम्हें लिखने बैठी हूँ तो जी चाहता है कि वो एक एक बात लिख दूँ जो तुम्हारे मन को  ख़ुशी दे , सकूँ दे , करार दे और मन को फूलों की तरह हल्का फुल्का और सहज कर दे। ....

 लेकिन मैं अपने दुखी दिल से तुम्हें ऐसा कैसे  दे  सकती हूँ कि रात रात भर जाग जाग कर तड़पती हूँ ,इतने अश्क आँखों से बहाती हूँ कि नदियां समुन्दर सब भर जाए और इतनी  जोर जोर से तुम्हें अपनी अंतरात्मा से  पुकारती हूँ कि क्षीर सागर में विश्राम करते विष्णु भगवन  चौंक कर जग जाए और मां लक्ष्मी घबरा उठे  सनम यह सच्चे प्रेम की पुकार है , तड़प और बेचैनी है जो तुम शायद समझ सको सनम तेरे सिवाय और कोई भी मेरा नहीं सिर्फ तुम और सिर्फ तुम ही मेरे सबकुछ हो , जान सको तो जान लेना ,
 वैसे सच तो यही है कि  तुम मेरे मन की एक एक बात समझ जाते हो जो मैं तुमसे कहती भी नहीं हूँ और चाह कर भी कह नहीं पाती हूँ क्योंकि मुझे तुम्हारे प्रेम के आलावा कुछ और याद नहीं रहता है और न मैं याद रखना चाहती हूँ। ...
मेरा प्रेम तुम हो और सारे जहाँ की खुशियां तुमसे हैं
अब मर्जी है तुम्हारी कि मुझे तुम सुख देते हो या दुःख ,,,
सीमा असीम
२५,६,१९ 

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