न होश है न ही ख्याल  है अपना
ज़िंदगी की दौड़ में दिन गुजरते हैं
सुनो प्रिय
            ज़िंदगी के तमाम दुखों सुखों के बीच दिन निकल रहे हैं खुद का होश रहता ही नहीं है बस बेजान जिस्म के साथ यूँ ही जी रहे हैं जैसे अशोक वाटिका में सीता जी उन अनंत अशोक पेड़ों की छाया में अपने दिन गुजर रही थी उनके साथ कई राक्षस साथ थे किन्तु मेरे साथ सब प्रिय जन हैं स्वजन हैं जो हर तरह से मेरा ख्याल रखते हैं किन्तु मैं बावरी अपनी सुध बुध बिसराये बस खोई रहती हूँ दर्द बहाती हूँ आँखों से और खाने पीने से बेखबर तुम्हारी दुनिया में खोई रहती हूँ जानती हूँ मेरे यूँ दुखी होने से तुम्हे भी कष्ट होता होगा लेकिन क्या करें इस तड़पते हुए दिल को किस तरह से समझाएं , किस तरह से तसल्ली दें और किस किस तरह से ढांढस बँधायें कि यह किसी हाल न समझता है न ही शांत होता है दुनिया की साडी खुशियों के बीच मैं उस अथाह दर्द और तकलीफ को सह रही हूँ जिसका कोई भी इलाज नहीं है कोई भी सकूँ नहीं है आज मंदिर किस तरह से आँखों से आंसू बह रहे थे जो किसी भी  रोके नहीं  जा रहे थे आरती पूजा के बीच मैं अपनी हिचकियों को रोकने का प्रयास   नादान दिल नहीं समझा न आंसू रुके , मेरे माही  बता दो मुझे इतनी तकलीफ क्यों देते हो मैं तो सिर्फ तेरी ही   में डूबा देते हो , प्रदोष व्रत था और आज का व्रत यूँ ही बिना खाये पिए बेसुध पड़े हुए ही गुजर गया। .... यह दर्द यह तकलीफ तुम समझ जाते अगर तो यूँ    रोना तड़पना  नहीं पड़ता , सनम मैं तेरी हूँ सिर्फ तेरी तू फिर क्यों मुझे यूँ रुलाता है न जाने कैसे कटेगी आज की यह लम्बी रात
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दुआ में उठे हैं हाथ  सनम खुशियों के लिए
दुःख दर्द फिर क्यों बेबजह चले आते हैं।
सीमा असीम
३१,५,१९ ... 

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