सुनो प्रिय
               जी चाहता है कि मैं तुम्हें फोन करूँ पूछ लूँ तुमसे एक एक बात लेकिन फिर  दिल  भर आता है तुम्हारी कही बातों को याद करता है और तुम्हारा नो डाइल  करती हुई मेरी उँगलियाँ थम जाती हैं मैं रुक जाती हूँ  सबकुछ  वक्त के हाथों छोडकर शांत होकर बैठ जाती हूँ कि अब जो भी होगा अच्छा ही होगा जब तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आता एक बार भी तुम्हारे मन में मेरा नाम नहीं आता तो फिर क्या फायदा कुछ भी कहने या सुनने का जब तुम्हें समझ आएगी तभी तुम भी समझ लोगे हर बात क्योंकि तुमने मुझे अपनी पत्नी बनाया है और क्या तुम जानते नहीं कि पत्नी की कितनी जिम्मेदारियां होती हैं लेकिन तुम्हें क्या फर्क पड़ता है  तुम जो मन आये वो करो क्योंकि तुम तो आजाद ख्याल इंसान हो न तुम्हारी खुद की यह आजादी ही तुम्हें यूँ  डिप्रेशन में  ले जा रही है कभी सोचा है मेरे बारे में कि  मैंने तुम्हारे लिए खुद को मिटा दिया तुम्हारी ख़ुशी के लिए खुद को ख़त्म कर दिया पर तुम्हें क्या मैं जी  मर रही हूँ कभी  मेरी आँख के आंसू बहते बहते थक गए सुर्ख लाल आँखों में  गांठे सी पड़ गयी फिर भी प्रिय मैं तुम्हें चाहती  करती हूँ और तुम्हारे दुःख से द्रवित हो जाती हूँ। ...

तुम क्या जानो कैसे कटते  हैं यह रात और दिन
कोई आग मेरे जिस्म को खाक करती है।
सीमा असीम

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