पिघल रहा है मन और अश्क बाह रहे हैं
न जाने क्यों न जाने क्यों। .
सुनो
    मुझे सच में समझ नहीं आ रहा है कि आज ऐसा क्यों हो रहा है क्यों दर्द बहे जा रहा है जितना संभाला चाहती हूँ मन उतना और पिघलता जा रहा है ,सुबह से ही मन उदास और जिस्म बेजान सा है न चल रहे हैं हाथ पांव न ही दिमाग काम कर रहा है सनम तुम बहुत याद आ रहे हो बेहद  बेइंतिहा ,,,,जैसे नदी अपने तट बांधों को तोड़ कर दौड़ जाना चाहती हो ,,,,,,सनम जिंदगी में इतना दर्द  क्यों होता है,,, या वे लोग ही हमें दर्द क्यों देते हैं जिनको हम अपना समझ लेते हैं या अपना समझने की भूल करते हैं शायद दुनिया में कोई भी अपना होता ही नहीं है हम खुद तक अपने नहीं होते हम सिर्फ अपनी सांसे पूरी करते हैं अपने लिए जीते हैं और अपने लिए ही मर जाते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं सोच पति मैं उनको ख़ुशी देना चाहती हूँ हर तरह से जो मेरे हैं जो मेरे  और पूरी  कोशिश भी करती हूँ लेकिन हमारे हाथ में आता है उन सबका बेदर्द स्वाभाव जो तकलीफ देता है बहुत दर्द देता है इतना कि मैं अपना पेट पकड़ कर जोर जोर से चीखना चाहती हूँ चिल्लाना चाहती हूँ और पूछना चाहती हूँ की ऐसा क्यों करते हो क्यों हमें सिर्फ दर्द और आंसूं देते हो ,क्या तुम हमें अपना नहीं समझते ,क्या तुम हमें जरा सी खुशियां नहीं दे सकते ,बोलो , बताओ मुझे , मैं इस दर्द से किस तरह निजात पाऊँ ,बोलो , या यूँ ही इस दर्द में तड़प तड़प के मर जाऊँ , लेकिन मेरे मन में कोई झूठ नहीं     एकदम से  सच में प्रिय मासूम सा मन है मेरा। ..

यह छह जो जगी मन में इसने   तड़पा कर रख दिया
दर्द दिया इतना बस रुला कर रख दिया ,,,,,

सीमा असीम 

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