कोई भी परवाह नहीं है इस दुनिया की तल्खियों की
हूँ मासूम परिंदा सा मैं। ..
 सुनो प्रिय
 यह सच है कि  मेरा मन किसी मासूम बच्चे की तरह से निर्दोष है इतना सरल और सच्चा जैसे किसी नए जन्में बच्चे का होता है एकदम से सच्चा ,यही सच है प्रिय क्योंकि मुझे इस दुनिया में किसी से न कुछ लेना है और न ही अपने साथ लेकर जाना है जो जैसा है वो वैसा ही प्यारा है लेकिन न जाने क्यों कभी कभी दिल बहुत उदास और परेशां हो जाता है तब जी चाहता है कि फुट फुट कर खूब रो लो बहा दो सारा दर्द और खुद को खली करलो और पुकार लूँ तुम्हें अपनी आत्मा की गहराइयों से आवाज लगते हुए ,,, क्या तुम जानते हो प्रिय कि  दिल तुम्हें क्यों चाहता है मुझे तो नहीं पता है बस तुम्हारे दर्द में आँखें भर आती है और तुम्हारी ख़ुशी में मन मुस्कुरा देता है क्योंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूँ तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी खुशियां हैं और दुःख भी। ..सुनो सनम कितना प्यारा संसार था हमारा जहाँ खुशियां थी सुखं थे प्रेम था लेकिन तुम जाने किस छह में फंस गए और बेहद प्यारी बेहद खूबसूरत दुनिया बदसूरत सी लगने लगी दर्द के सागर में डूबने उतरने लगी ,,,पता नहीं क्या हुआ तुम्हें कि उदासियों ने अपना कब्ज़ा कर लिया मुस्कान जैसे रूत सी गयी खैर कोई नहीं दिन जाते देर नहीं लगती कभी सुख कभी दुःख यह तो आने जाने हैं आज नहीं तो कल मेरे दिन आएंगे सिर्फ मेरे प्यारे दिन। ..
ख़ुशी होगी खुसहाली होगी
दर्द का नामों निशान नहीं होगा
आय सनम हमारा जीवन
अब तेरे हवाले है। ...
सीमा असीम 

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