गुजर जाती हैं रातें यूँ ही याद करते हुए
अश्क ठहरे रहते हैं आँखों में सनम ,,,
सुनो प्रिय 
             तुम्हें याद नहीं करती हूँ लेकिन तुम याद रहते हो, जितना करती हूँ कोशिश भुलाने की तुम याद आते हो, मैं कैसे काट लेती हूँ सारी रात तुम्हें अपने यादों का साया बनाये, अपने में समेटे लपेटे हुए, मुझे खुद भी याद नहीं रहता, हाँ बस इतना जरूर याद रहता है कि तुम मेरी यादों में रहते हो, एक दिन हम मिलेंगे इस ख्वाहिश में रात और दिन गुजरते रहते हैं लेकिन कब ?  नहीं जानती,  क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं होता है कि तुम मेरी भावनाओं के साथ गलत कर रहे हो ? 
   लेकिन मैं तुम्हें कुछ भी कहना नहीं चाहती क्योंकि मैं समझती हूँ कि अगर मैं तुम्हें कुछ कहूँगी तो तुम्हें नहीं खुद को कहूँगी बस यही ख्याल मुझे चुप रहने को मजबूर कर देता है , हाँ मैं भी चुप रहूंगी, एकदम से चुप लेकिन मेरे सनम तुम इतने खामोश कैसे रह लेते हो ? किस तरह से ? बताओ मुझे ? क्या तुम्हारे पास दिल नहीं है?  धड़कन नहीं है ? भाव नहीं विचार नहीं है?  या प्रेम नहीं रहा ?
   सुनो प्रिय जिस दिन प्रेम ख़त्म होगा, उस दिन ही यह दुनिया ख़त्म हो जाएगी , सब ख़त्म हो जायेगा, बचेगा तो सिर्फ हाहाकार, त्राहि त्राहि कि प्रेम में सिर्फ सच का साथ होना जरुरी है, झूठ का साया पड़ते ही प्रेम का अस्तित्व मिट जाता है, ख़त्म हो जाता है, जब तुम मुझसे कुछ कहते हो तो तुम पहले की तरह सच्चे और मासूम नहीं लगते, सनम न जाने क्यों तुम मुझे गुनहगार से नजर आते हो, तुम्हारी आँखे, तुम्हारा चेहरा, तुम्हारे झूठ की चुगलियां करते हुए लगता हैं क्योंकि प्रिय तुम खुद को उतना नहीं जानते और समझते हो जितना मैं जानती और समझती हूँ हाँ प्रिय तुम्हें मैं खुद से ज्यादा जानती और समझती हूँ ,,,,,,
जीती हूँ जब सिर्फ तुम्हे तुम्हारे खोल में घुसी रहती हूँ 
खुद को भूली हूँ और तुम्हें याद रखती हूँ। . 
सीमा असीम 
३०. ५. १९  

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कुराना

याद