कह दी आज उनसे दिल की हर बात
दिल खाली खाली सा क्यों है 
सुनो प्रिय न चाहते हुए भी आज दिल की हर बात उनको कहनी पद गयी क्या करें दर्द ही इतना था कि सहा नहीं जा रहा था रो रो कर आँखें सूज गयी थी आखिर दिल खोल कर रख दिया अब चाहें तो वे हमें जो समझे समझने दो क्या फर्क पड़ता है उन्हें भी शायद ख़ुशी ही मिली हो तड़पते हुए दिल को शायद रहत ही मिली हो कितना तड़पा था दिल उनसे जुड़ा होकर ,कितना मचल रहा था मानों आग में जल रहा हो जैसे झुलस के कला पद गया हो या जलकर राख में तब्दील हो गया हो ,और ताप इतना कि  जिस्म आग का अंगारा बन गया हो ,यह इश्क की तड़प ,यह इश्क की आग कहीं जलाकर खाक न कर दे लेकिन जो भी करे कर दे इस तकलीफ से छुटकारा भी तो नहीं है क्योंकि हमने जान बुझ कर तो लगायी नहीं है ये लगाए न लगे यह बुझाये न बुझे आह यह इश्क मुझे इस कदर तनहा कर देगा सोचा न था ,सनम क्या कहूं कि मैं तुमपर मर मिटी हूँ और तुम्हारी हर बात मुझे प्यारी लगती है तुम जैसे भी हो जो भी हो मुझे स्वीकारे हो मेरे दिल पर राज करने वाले मेरे प्रिय तुम  भी तो यूँ ही कभी तड़पते होंगे दर्द में मचलते होंगे फिर भी कैसे मन को वश में कर लेते हो कैसे मन को समझा लेते हो और कैसे इस दर्द में दुबे रहकर भी दुनिया के जरुरी सब काम कर लेते हो ममुझे तो जिया ही नहीं जाता खुद में रहा ही नहीं जाता कि मन कर दिया है मैंने सनम अब तो बस तुम्हारे हवाले ,जैसे चाहे वैसे रखो या तो उबार लो या और गहरे डूबा दो। .. 
बांध लिया है मन से मन का तार 
सब कुछ तेरा मैं गयी दिल  हार  !

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