पुकारता रहा रोम रोम आत्मा दर्द से सिहरती रही
बहता रहा आँखों से लहू कोई सदा तुम तक पहुंची या नहीं
सुनो प्रिय
नहीं जानती मैं कि क्यों मेरी आँखों से लहू बहता रहा, दिल दर्द से  रोता  रहा, क्या पता तुम तक मेरी आवाज गयी या नहीं या आत्मा की आवाज आत्मा में ही दब घुट कर मर गयी ,इस दर्द को सहना नामुमकिन है किन्तु सह रही हूँ और जी भी रही हूँ इस तरह से जैसे जीवन नहीं है मुझमें कोई बेजान सा जिस्म सा है जिसे मैं घसीट रही हूँ न कितना भारी बोझ अपने सर पर उठाये फिर रही हूँ, सोचती रहती हूँ कि तुम ऐसे कैसे हो ?क्यों हो ? क्या तुम्हारे पास दिल नहीं है अगर है तो फिर पत्थर का ही होगा ,या फिर मुर्दा दिल होगा ,जो सब जानकर भी समझ नहीं पाता होगा , कितने आंसू बहे सारी रात और कितना दर्द उठा ,,,तुम्हें कैसे समझ आएगा, जब तुम बेपरवाह  हो गए ,,,,,,जानते हो सनम, यह प्रेम की पुकार है और दिल से दिल तक जाती जरूर है लेकिन तुम मनमानी करना चाहते हो, तो करते रहो मन मानी कोई बात नहीं बस इतना ख्याल रखना प्रिय हमें वही सबकुछ वापस मिल जाता है जो हम किसी को देते हैं चाहे मान सम्मान हो ,प्यार हो , इशक हो या दर्द या धोखा ,,,कुछ भी सब वैसा ही लौटेगा वेश बदल कर ,,,हैं न। .. प्रेम कभी कुछ नहीं चाहता अगर सच्चा हो तो बस उसकी चाहत होती है उसके सच होने की जिससे वो उसपर आँख मूंदकर भरोसा करती रहे ,उसकी हर बात सच लगे और सच हो भी ,,,सनम तुम्हें समझना होगा गर समझ सको
दिल का मामला है यह कोई खेल नहीं है ,,,,,

सीमा असीम
२९,५,,१९

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