पहाड़ aur मैं
पहाड़ पर फैली हरियाली को
यूँ ही खामोशी से
एकटक निहारने का मन था
आगंतुकों को पुकारती
देवदार की फैली भुजाओं को
एकाग्रता से देखने का मन था
पर न जाने कहाँ से आ गये
आवारा से नीर भरे बादल
और ढक दिया अपने गीलेपन से
कर दिया सब पानी पानी
न रही चमक न रही रोशनी
धुंधला गया सबकुछ
पेड़ों पर कोई पंक्षी की
पुकार नहीं
रिमझिम बारिश से भीगी सड़कों पर
कोई चहल कदमी नहीं
बस आती जाती गाड़ियों में
दुबक कर बैठे लोग
घर पहुँचने की जल्दी में
छतरी लिए लोग
लपक के शेड की ओट लेते हुए
फिर भी प्यारा लगा
यह अनदेखा रूप
जब पानी ही पानी था
हर ओर
फिसलती हुई ट्रेन से
या कार के शीशे से दिखाई देते हुए
झरना, नदी और बादल
सब लबालब भरे भरे से
जैसे कहना चाहते हो
इस रूप मे
अपने सारे दुख दर्द को....
Seema Aseem Saxena
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