तुम्हारा जीना
जब तुम मुझे याद करते होगे
सिर पर हाथ रखकर रोते होगे
या जाकर बैठ जाते होओगे
बाहर रखे झूले पर और
खामोशी से आसमा को देखते
रहते होओगे
कभी निहारते होओगे
खिलती हुई कलियों को
या कभी फूलों को देखकर
मन में मुस्कुराते होओगे
या प पीते के पेड़ से लिपटी
उस नाजुक बेल को हाथों से
छूकर कोमलता से सहला देते होओगे
तभी आकर बैठ जाती होगी
हरसिंगार के पेड़ पर एक गौरैया
इधर उधर देखती हुई
अपनी चोंच से कुछ तोडती हुई
अपनी मध्यम सी आवाज में
चाह्चाहा देती होगी तो उस वक्त
टूट जाती होगी तुम्हारी तन्द्रा
और तुम उस चिड़िया में देख लेते होगे अक्स
जाकर उससे बात करने को उठते होगे
लेकिन तब तक वो फुर्र से उड़ जाती होगी
डर कर
तुम्हारी आहट पाकर
नहीं समझ पाती होगी तुम्हारे प्रेम पगे मन को
हाँ मैं इस चिड़िया सी ही तो हूँ
छोटी सी भोली सी
और तुम्हारे मन की हर बात से अनजान
तुम कभी कह क्यों नहीं देते आकर
खोल कर रख क्यों नहीं देते अपने मन को
मेरे सामने
ताकि तुम जी उठो
मुझे प्रेम का भार मुझे सौंपकर .....
सीमा असीम
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