बारिश
बारिश
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अचानक से
स्मृतियों के द्वार से
अंधकार को चीरते हुए
एक लौ की तरह
आ जाओ तुम
और नमी भरी मेरी आँखों पर
रख दो अपनी गर्म हथेलियां....
बिना कहे ही मैं
पहचान जाऊँ तुम्हें...
कैसी हूँ मैं?
तुम पूछ भी न सको
और मैं बता भी न पाऊँ
तुम्हारे असीम प्रेम से
ओतप्रोत हो
मैं निखर जाऊँ
जी उठूँ एक बार पुनः
जैसे सावन की बारिश से
हरिया जाते हैं
सूखते मुरझाते पेड़ पौधों भी ....
खिल जाएं गुलाब
चँपा महक जाये
जब कभी
मेरा मन घबराता था
ज्येष्ठ की तपती गर्मी सताती थी
तब मेरा माथा महसूसता था
तुम्हारे अंकित किये गये स्पर्श को
या हल्की सी खटक भी
अहसास कराती थी
तुम्हारे आने का....
पर यह क्या है कि
तुम आये तो ले आये
अपने संग संग बारिशें भी
आँखों में भी और आंगन में भी
खुशी की
खुशहाली की....
सीमा असीम, बरेली
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