सीमा असीम, बरेली
कालका शिमला की धरोहर टॉय ट्रेन और बाबा भलखु
यात्रा वृतांत
शिमला के वरिष्ठ साहित्यकार एस आर हरनोट जी द्वारा आयोजित बाबा भलखु स्मृति कालका शिमला की साहित्यिक यात्रा के लिए जाना था, इसमें करीब 35 साहित्यकारों को बुलाया गया था, अन्य साहित्यकारों के साथ इसमें मेरा भी नाम शामिल हो गया था यह जानकार जाने के लिए तैयारियां शुरू कर दी थी ! उस दिन ही कंफर्म टिकट मिल गया तो खुशी दोगुनी हो गई! अब तो कोई अड़चन नहीं आयेगी, अब तो जाने को मिल ही जायेगा इस यात्रा से ज्यादा ख़ुशी इस बात की थी कि सब साहित्यकारों से मिलना होगा, उनके विचारों से अवगत होना खुद को और भी ज्यादा समृद्ध करता है, अपने जैसे लोगों के बीच होना, बोलना चालना खाना पीना सब साथ साथ ! दो दिन की यात्रा थी, 8 और 9 जुलाई को और दो दिन आने जाने में यानी कुल मिला कर चार दिन की यात्रा थी ! घर में भी सब लोग मान गए थे किसी ने मना नहीं किया! एक तो शिमला जाने की खुशी और दूसरे साहित्यिक यात्रा की खुशी थी, साथ ही हमारे टिकट भी कंफर्म थे! हमारे साथ में जाने वाली एक महिला जो बरेली शहर से थोड़ी दूर लगभग40 किलोमीटर दूर आवला शहर में रहती थी, वह और मैं,
हम दोनों साथ-साथ जाने वाले थे पर अचानक उसने जाने से मना कर दिया उसकी बेटी को कुछ प्रॉब्लम हो गई थी तो मैंने सोचा मैं भी नहीं जाती हूं घर वालों ने भी जाने को मना किया कि मौसम सही नहीं चल रहा है अभी आने वाले दिनों में भयंकर बारिश आने वाली है ऐसा करके मना कर रहे थे ! पर मैंने प्रोग्राम बना लिया था तैयारी भी कर ली थी और शिमला जाने का मोह मुझे खींचे लिए जा रहा था कितने दिनों से नहीं गई थी और अभी प्रोग्राम भी था और साथ ही साथ सभी लोगों से मिलना जुलना भी हो जायेगा !
हरनोट सर के अथक प्रयासों के द्वारा आयोजित किया गया यह प्रोग्राम बाबा भाल्खु की स्मृति में किया जाने वाला बहुत ही अच्छा समारोह था तो जाना तो बनता था ! खैर घर में सबको मनाकर सही समय पर हम घर से निकले और जाकर ट्रेन में बैठ गये, रास्ते में कोई दिक्कत नहीं हुई पूरा सफर बहुत आराम से कट गया, ट्रेन राइट टाइम थी और हम बरेली से चंडीगढ़ पहुंच गए !
चंडीगढ़ से हमें कैब लेकर आगे शिमला जाना था जहाँ पर हरनोट जी द्वारा आयोजित बाबा भाल्खु स्मृति यात्रा आयोजित की गयी थी ! हमें चंडीगढ़ में ही ज्योति बक्शी और लखविंदर सिंह नाम के दो लेखक साथी और मिल गए ! हम तीनो लोग वोल्वो में चंडीगढ़ से शिमला तक जाने के लिए सवार हो गये ! रास्ते में ही खूब बारिश शुरू हो गई थी घुमावदार रास्ते और उस पर बारिश बड़ा सुहावना मौसम हो रहा था, सब कुछ बहुत अच्छा अच्छा लग रहा था, वीकेंड होने के कारण आज रोड पर बहुत ज्यादा रश था ! बहुत सारी गाड़ियां मैदानी शहर से ऊपर पहाड़ की ओर जा रही थी, पहाड़ों की शीतलता में अपने शहर की गर्मी को दूर करने को दो दिन के लिए चली जा रही थी, इसी कारण जगह-जगह पर जाम लग जा रहा था और इस वजह से हम लोग करीब तीन घंटे लेट पहुंचे !
हमें वहां पर तीन बजे तक पहुंचना था लेकिन हम लोग शाम के छह बजे वहां पर पहुंचे ! शिमला के बहुत ही अच्छे होटल में हम लोगों के रहने का इंतजाम हरनोट सर जी द्वारा पहले ही कर लिया गया था अतः हम लोग सीधे वही पहुंचे और अपने अपने रुम में शिफ्ट हो गए ! वहां पर सब अलग-अलग शहरों से आए हुए लोग थे जैसे दिल्ली, पटना, अमृतसर, कानपुर आदि शहरों के अन्य लेखक भी ठहरे हुए थे !
थकान की वजह से हम लोग का चाय पीने का मन कर रहा था तो सबने अपने-अपने रूम में ही चाय मंगा ली और स्वादिष्ट चाय का आनंद लिया ! इस सुहावने मौसम में चाय का स्वाद दोगुना हो गया था ! डिनर के समय पर होटल में ठहरे हुए सारे लेखक लोग रेस्टोरेंट में इकट्ठे हो गए थे ! सभी ने एक साथ ही खाना खाया खाना बहुत अच्छा था ! एकदम से सादा खाना बिलकुल घर जैसा, तो उसे खा कर मजा ही आ गया और फिर हम लोग थोड़ी देर गपशप करने के बाद अपने अपने कमरों में जाकर सब सो गए क्योंकि सुबह जल्दी उठना था और वहां से सीधे स्टेशन पहुंचना था जहाँ से हमारी साहित्यिक यात्रा शुरू होनी थी !
सुबह सात बजे का अलार्म लगाया था लेकिन आँख छह बजे ही खुल गयी फिर सोने की कोशिश की लेकिन नींद ही नहीं आई क्योंकि इस सुन्दर यात्रा को देखने की ख़ुशी मन को लबरेज किये दे रही थी खैर यूँ ही सोचते विचारते जब सात बज गए तो मैं जल्दी से उठी और नहा धोकर तैयार हो गयी ! होटल के रेस्टोरेंट में बैठकर एक कप चाय पी और रिसेप्शन पर आ गयी वहां पर सभी लोग आ गए थे फिर हम सब लोग कार में बैठकर स्टेशन पर पहुंचे, वहां पर सबसे पहले बारिश ने हमारा स्वागत किया, वहां पर स्थानीय लेखक लोग पहले से ही आ गये थे !
कुछ ही देर में हरनोट सर आ गए और उन्होंने सभी का बड़ी गर्म जोशी के साथ स्वागत किया ! उसके बाद हम लोग नाश्ते के लिए कैंटीन में गए और गर्मागर्म स्वादिष्ट आलू के परांठे, दाल, दही और मक्खन का स्वाद लिया उसके बाद गर्म इलायची वाली चाय ने मन को प्रसन्न कर दिया ! बारिश अपना सुन्दर रूप अभी भी दिखा रही थी !
बढ़िया सी रिफ्रेशमेंट लेने के बाद हम सब लोग कैंटीन से बाहर निकल आये, तब तक हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ (कर्नल) धनीराम शांडिल्य शांतिलाल जी आ गए थे ! वे हमारी साहित्यिक रेल यात्रा के मुख्य अतिथि थे! उनको हरनोट सर जी ने बुके देकर, शॉल ओढाकर स्वागत किया ! इसके साथ ही वहां के सहायक स्टेशन अधीक्षक ने मंत्री जी व् हरनोट जी को पौधे आदि दिए! उनके साथ में 4, 5 अन्य सहयोगी भी थे ! उनका ग्रुप आते ही माहौल बड़ा खुशनुमा हो गया था ! इसके बाद उन्होंने हम सभी लेखकों को हिमाचली टोपी, मफलर और स्मृति चिन्ह आदि देकर सम्मानित किया फिर दीप्ति सारस्वत जी के कहानी संग्रह और सीमा असीम के उपन्यास का लोकार्पण किया ! सभी को शुभकामनाएं देते हुए मंत्री जी विदा हो रहे थे लेकिन हम सब लोगों के आग्रह पर वे हमारे साथ टोय ट्रेन में बैठ गए और वहां से दो तीन स्टेशनों के बाद तारा देवी स्टेशन तक साथ साथ चले ! वे बोले कि यह एक अनूठी यात्रा है और हरनोट जी इसके लिए बधाई के पात्र हैं जो एक मजदूर को इतना सम्मान दे रहे हैं ! पेपर मीडिया व् इलेक्ट्रोनिक मिडिया लगातार इन सब चीजों का कवरेज कर रही थी ! उन्होंने साहित्य के विषय में बहुत अच्छी-अच्छी बातें की क्योंकि वे खुद ही बहुत विद्वान और साहित्यिक व्यक्ति हैं, जिसकी वजह से ऐसी साहित्यिक यात्रा में उन्होंने अपना योगदान देकर हम सभी लेखकों का उत्साहवर्धन किया !
लोक कलाकारों ने बहुत अच्छे-अच्छे पहाड़ी लोकगीत सुनाएं ! लोकगीत सुनकर अभी को आनंद आ रहा था गीत संगीत ने माहौल को बड़ा अच्छा बना दिया था ! ट्रेन के अंदर हम सब लेखक लोग और आसपास दोनों साइड में कभी सुरंग और गुफाएं और कभी गहरी गहरी खाइयाँ और कभी देवदार के पेड़ों से घिरे हुए घने पहाड़ी जंगल हमारे साथ साथ चल रहे थे और वे भी इस साहित्यिक रेल यात्रा के गवाह बनते जा रहे थे !
बेहद सरल सहज पारिवारिक वातावरण था ! कविताओं का सेशन चल रहा था सभी अपनी अपनी प्रतनिधि रचनाओं को सुना रहे थे ! हरनोट जी बीच बीच में रास्तों, पुलों और बाबा भाल्खु जी के बारे में चर्चा करते जा रहे थे ! किस तरह से गुफाओं को बनाया और किस प्रकार से उन्होंने रास्ते ढूंढे, सुरंगे बनबाई और यहां पर क़िस तरह से पहाड़ों पर रास्ता खोजा क्योंकि यह एक बहुत कठिन काम था ! जब अंग्रेज पूरी तरह से हार गए थे उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था तो उस वक्त उसी पहाड़ी अंचल में पले बढ़े बाबा भाल्खु ही काम आये थे क्योंकि उनको यहाँ के सारे रास्ते पता थे ! इस तरह जानकारी और साहित्य दोनों की ज्ञानगंगा साथ साथ बह रही थी ! साहित्यकारों, लेखकों व कवियों के लिए यह यात्रा कुछ अलग सा अहसास करा रही थी ! बारिश भी लगातार हो रही थी जिससे आज मौसम बहुत अच्छा हो रहा था ! लग रहा था इस सब कुछ ऐसे ही चलता रहे लेकिन कैसे ? जैसे हर सफर की एक मंजिल होती है वैसे ही इसकी भी मंजिल आ गई थी और लंच का समय भी हो रहा था आखिर हम लोग बढ़ोग स्टेशन पर उतरे और वहां पर उपस्थित मीडिया ने हमारा स्वागत माला पहनाकर किया, साथ ही सबका इंटरव्यू भी लिया ! उसके बाद खाना-पीना किया और फिर हम सब लोगों ने बारिश में भीगते हुए फोटोग्राफी की क्योंकि बारिश हमारा साथ बड़ी शिद्दत के साथ निभा रही थी !
हम लोग वापस जाने के लिए ट्रेन में बैठ गये !
वापस लौटते समय कहानी का सत्र शुरू हो गया था ! कहानियां सुनने में मगन हम लोगों को समय का अहसास ही नहीं हुआ कि कब शाम हो गयी , हमारी इस यात्रा में हमें पाठक व श्रोता भी मिले जो हमारे साथ घुल मिल गये ! शायद बारिश होने के कारण ट्रेन बहुत धीरे-धीरे चल रही थी ! हमको जिस समय पहुंचना था उससे करीब दो-तीन घंटे लेट ही पहुंचे थे ! जब वहां पहुंचे तो स्टेशन पर जो ऑफिस दुकान आदि थी वह सब बंद हो गई थी ! अगले दिन फिर सबसे मिलने का वादा करते हुए मुस्कुरा कर विदा ली और होटल के अपने रूम में जाकर आराम किया !
रात का खाना खाकर जल्दी ही सो गए क्योंकि अगले दिन फिर सुबह जल्दी उठना था ! अगले दिन की यात्रा में सुबह हम लोगों को बस के द्वारा बाबा भाल्खु के गाँव जाना था इसलिए सभी लोग बस में सवार होकर चल दिए ! सबसे पहले हम लोगों को कुफरी के एक शानदार रेस्टोरेंट में नाश्ता कराया गया, जहां पर छोले भटूरे, परांठे, चाय , कॉफी आदि यह सब चीजें थी ! वहीं पर दीप्ति सारस्वत जी की पुस्तक “कहानी संग्रह” “प्याली भर जुगुप्सा ” पर कुछ चर्चा हुई और फिर आगे हम लोग चायल पैलेस की तरफ चल दिए ! जहां हम लोगों को लंच करना था ! रास्ते में लोक गायक अपने पहाड़ी गीतों से हम सभी को आनंद प्रदान कर रहे थे, कोई नाच रहा था कोई गा रहा था ! बाहर पानी की बारिश हो रही थी और बस के अंदर संगीत व् नृत्य का आनंद लिया जा रहा था ! ठीक समय पर हम लोग चायल पैलेस में पहुंचे ! वहां पर पैलेस का जायजा लिया, खूब घूमे, फोटोग्राफी की फिर लंच किया ! यहां पर लंच बहुत स्वादिष्ट था जिसमें दाल चावल, रोटी, पनीर की सब्जी, मिठाई में खीर थी ! पैलेस में शाही भोजन करने के बाद वहन के स्टाफ के साथ थोड़ी बहुत बातचीत की ! स्टाफ बहुत सपोर्टिव था और स्टाफ के साथ सब लोगों ने फोटो के लिए, फोटो लेने के बाद वापस चलने की तैयारी हो गयी !
बारिश बहुत तेज हो रही थी और रास्ते बहुत खराब हो रहे थे जिस वजह से हमारी यात्रा का प्रमुख स्थल जिसकी स्मृति में यह साहित्यिक कार्यक्रम हो रहा था वहां जाने का रास्ता बंद हो गया ! पर वो कहते हैं न कि अगर कुछ अधुरा रह जाए तो आगे उसके और भी रास्ते खुलते चले जाते हैं शायद इसी लिए यह सब हुआ बारिश और रस्ते खराब होना तो सिर्फ एक वहाना मात्र बन गया था ! हरनोट जी को भी अच्चा नहीं लग रहा था और वे कह रहे थे इस अधूरी यात्रा को जल्दी ही फिर पूरा करेंगे ! खैर हम लोग थोडा उदास हुए लेकिन अभी भी उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी ! बाद में बस के अंदर सभी जोर शोर से अपने कहानी कविताओं का पठान पाठन कर रहे थे ! बाहर बारिश तेज थी और अंदर साहित्य की चर्चाएं ! बारिश के कारण ख़राब हुए रास्तों की परवाह किये बिना सभी लोग मगन थे क्योंकि बस एक कुशल पहाड़ी ड्राइवर के हाथों में थी और वह टेडी मेडी, घुमावदार ,गहरी ऊँची, खाइयों वाले रास्तों पर बड़ी आसानी से बस चलाता हुआ लिए जा रहा था !
लौटते में हम लोग वहां पर फिर रुके जहां पर सुबह नाश्ता किया था, वहीं पर बैठकर सभी ने शाम की चाय कॉफी पी और थोड़ी बहुत कहानी, कविता पाठ भी किया ! वहां पर जो अन्य लोग आए थे वह सब भी हमारे ग्रुप में शामिल हो गए और हमारी कविता कहानियों का रसास्वादन लेने लगे, साथ ही वह हम लोगों का नंबर भी ले कर गए जिससे आगे भी मिल सकें ! बहुत आनंद आ रहा था ! इस तरह की साहित्यिक यात्रायें मन को सकूँ देने के साथ हमें मानसिक रूप से समृद्ध भी करती हैं ! अब सबसे विदा लेने का समय था सबसे जल्दी फिर मिलने का वादा किया और रात के 8:30 बजे तक हम सब लोग अच्छे से होटल पहुंच गये ! अब अगले दिन सुबह घर वापस जाने के लिए निकलना था ! डिनर करने का दिल नहीं था छोटा-मोटा कुछ खाया ! इसी बीच हमारे साथ होटल में ही ठहरे जो अन्य लेखक लोग थे उन सब लोगों के साथ में ढेर सारी बातें की ! एक दूसरे से विचारों का आदान प्रदान किया और देर से सोये ! सुबह जल्दी ही यहाँ से निकलने का मन बना लिया था क्योंकि बारिश बहुत तेज और लगातार हो रही थी ! रास्ते बहुत खराब हो रहे थे सबके घर से बराबर फोन आ रहे थे कि वापस कैसे निकलोगे वहां पर बारिश बहुत हो रही है वाकई में बारिश ने बड़ा कमाल दिखाया था सभी लोग कह रहे थे ऐसी बारिश तो 2013 में आई थी उतनी बारिश अभी इस बार आई है !
अगली सुबह 8:00 बजे तैयार होकर रेस्टोरेंट पहुंच गए थे, वहां पर चाय पी सेंडविच खाये और आकर अपनी कार में बैठ गये यहां से चंडीगढ़ के लिए रवाना होने के लिए ! बारिश होने के कारण रास्ते में बहुत पानी था, पहाड़ एकदम से पिघलते हुए दिखाई दे रहे थे और जो सड़क थी उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे पूरी पानी से भरी हुई है, वो न्यूज़ चेनल वाले कहते ह्येन न कि सड़क बह गयी उसका मतलब आज समझ आया था ! रोड पर लैंडस्लाइडिंग भी हो रही थी, लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहे थे जिससे किसी तरह वहां पर आवागमन में कोई रुकावट नहीं आ रही थी ! बस चलता हुआ रोड होने के कारण किसी को कोई परेशानी नहीं हुई फिर भी हम मैदानी लोगों को थोड़ा डर महसूस हो रहा था ! चंडीगढ़ पहुंचे तो वहां पर भी बहुत बारिश हो रही थी जिसकी वजह से हमारी ट्रेन कैंसिल हो गई फिर हम वॉल्वो और फ्लाइट करके वाया दिल्ली होते हुए अपने घर सकुशल पहुँच गये ! एक रोमांचक, ज्ञानवर्द्धक, मनोरंजक और खुशहाल साहित्यिक यात्रा करके अपने घर पहुंच गये फिर से एक बार दुबारा आने की आस लिए हुए !
सीमा असीम सक्सेना
बरेली
९४५८६०६४६९
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