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Showing posts from June, 2020

एक से...

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चाहती हूं मैं कि तुम बन जाओ बिल्कुल मेरे जैसे  जैसे मैं हँसू तो  तुम भी हंसो  जब मैं गाउँ तो तुम भी गाओ  जब मैं नाचूं तो तुम भी नाचो  या फिर बात करूं तो तुम भी बात करो  जब मैं उदास हो जाऊं तो तुम भी उदास हो जाओ  जब मैं घूमने के लिए कहीं पहाड़ों पर चली जाऊं  तो तुम भी मेरे साथ साथ चले आओ  क्योंकि मैं चाहती हूं तुम हो जाओ बिल्कुल मेरे जैसे   या फिर मैं हूं जाऊं बिल्कुल तुम्हारे जैसी  जब तुम रोओ तो मैं भी रोऊं  जब तुम उदास हो तो मैं भी उदास हो जाऊं  जब तुम रूठो तो मैं भी रुठ जाऊँ   जब तुम्हें गाना गाने का मन करे उदासी वाला  तब मैं भी उदासी वाला गाना गाउँ   तब जब तुम्हारा जो दिल करे  तो ऐसा ही मेरा दिल करने लग जाए  काश ऐसा ही हो जाए कि हम एक से हो जाए  या तो तुम हो जाओ मेरे जैसे  या फिर मैं हो जाऊं तुम्हारे जैसी  कोई भी अंतर ना रहे हम दोनों में  या मैं हो जाऊं तुमसी  या तुम हो जाओ मुझसे..  सीमा असीम

ख्वाबों की दुनिया

ख्वाबों के लिए  सोना जरूरी नहीं होता  जरुरी होता है ख्वाब देखना  कभी तुम्हें याद करना  जी भर रोना लेकिन   नहीं अच्छा लगता मुझे रोना  फिर क्यों उदास हो जाती हूं रोने लग जाती हूं  किया करो ना बात तुम हमसे   हर एक बात मुझसे  अच्छा लगता है ना  बात करना मन की कहना  हल्का सा मन हल्का हल्का सा  भारी भारी पल में जीना मुश्किल लगता है जीना भी अच्छा नहीं लगता  तुम बिन 

तुलसी का बिरवा

कविता तुलसी का बिरवा     मां के घर के आंगन में लगा   एक छोटा तुलसी का बिरवा   जिसमें मां सुबह-सबह जल चढ़ाती     शाम को दिया जलाती और   उसकी प्रतिदिन करती   पूजा अर्चना     कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनकी शादी करती    और देती रहती नसीहतें कि तुलसी के पौधे पर   इतवार के दिन ना जल चढ़ाना   और ना उसका पत्ता तोड़ना   मां कितनी अच्छी बातें बताती थी     उस बिरवे से कितनी रौनक़ थी हमारे घर में   अब कोई नहीं लगाता   अपने घरों में तुलसी का बिरवा   ना ही कोई अब जल चढ़ाता   न उनकी शादी रचाता     अब तो लोग लगाते हैं तुलसी का पेड़   चाय में डालने को   काढ़े में डालने को   अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने को   दवा बनाने को   उनका व्यापार करने को   क्योंकि हर चीज में देखते हैं आजकल   इंसान अपना स्वार्थ   अपना कारोबार   अपना व्यापार   अपना धन   कैसे बढ़ाएं ऐसा कोई तरीका     ...

दुनिया और तुम

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. दुनिया को बहुत  प्यारा और खूबसूरत होना चाहिए  जितनी प्यारी होती है कोयल की कूक  और कितने प्यारे होते हैं फूल पौधे और पत्तियां  कभी आपने देखा है  डाली पर खिले फूलों को  फूलों पर बैठी तितली को  मस्त गगन में उड़ती हुई चिड़िया को  कभी आपने देखा है  दूर क्षितिज तक  जहां पर बसता है सुंदर सा प्यारा जहां  यहां पर मिलता है धरती और आसमान  तुम देखना कभी  सुदूर देश से उड़ते चले आए हुए पंछियों को  बार-बार आकर वापस लौट जाने को  हां लौटना नियति है पर   आना भी जरूरी है  उतना ही जरूरी  जितनी जीने के लिए सांस  तुम आना सनम   जरूर आना  देखेंगे साथ-साथ  दुनिया को  और दुनिया के रिवाजों को  एक दूसरे की आंखों में देखते हुए  जीते हुए आखिरी दम तक... सीमा असीम 

बदली

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भर आती है आँख  और छलक जाती है  गीतों की स्वर लहरी  लबों पर खमोश हो जाती है  तुम तो भटकते फिरे सनम  यहाँ वहाँ  न जाने कहाँ कहाँ  मैं बन गयी एक बदली  जो ठहर गयी एक ही जगह पर  और बार बार बरस जाती है सीमा असीम  10, 6, 20

मेरा ईश्वर

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दर्द कोई देता है ज़ब मुझे  कराह उठती है  आत्मा मेरी  रोती है  चीखती है  चिंघाड़ती है  घायल कर लेती है खुद को ही  पर नहीं कहती है  कभी भी किसी से भी कुछ  सह जाती है अकेले ही  सबकुछ  ख़ामोशी से  फ़िर पोंछ देती है  मेरे बहते आँसू  सहला देती है  मुझे प्यार से  खिला देती  फूलों सी कोमल मुस्कान  उदास आँखों में भरती है चमक  दर्द से भरे जिस्म पर  मीठी सी छुअन  और  आ जाती है  जीवन में खुशियाँ  जाग जाती है मेरी आत्मा  जहाँ पर  रहता है  मेरा ईश्वर  हाँ बसता है मेरा ईश्वर  मेरी आत्मा में  जो नहीं होगा कभी जुदा मुझसे  मेरे जीवन में  या मरने के बाद भी.. सीमा असीम  9, 6, 20

बेचैनियाँ

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मन का क्या है हो जाता है कभी भी  कहीं भी  उदास  निराश  परेशान  भर जाता है बेचैनियों से  घबरा कर  मचल जाता है  घिर जाता है  अनिश्चिता में  न जाने कब  होंगी  खुशियों की सुबह  न जाने कब  खिलेंगे फूल  न जाने कब  मुस्कुरा उठेगा मन  जैसे गाने लगती है कोयल  आम के पेड़ पर  सुमधुर स्वर में  खींचे लिए जाती है  मुग्ध करके  भुला कर सुध बुध  वैसे ही मेरे सनम  तुम्हारे खामोश शब्द  पुकार उठते हैँ मुझे  मैं तड़प उठती हुँ  इस विरह को जीते हुए  और उसी क्षण  तुमसे मिलने को बेचैन हो जाती हुँ  फ़िर कहीं चैन नहीं पाती हुँ  बेक़रार हो  दीवारों से टकरा जाती हुँ  अपना सिर टिका देती हुँ  मैं हार जाती हुँ सनम  अपने प्रेम से  प्रेम के लिए  बेचैनियों में  घिरकर  सीमा असीम  8, 6, 20 

प्यारी है परिंदों की दुनिया

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कितनी प्यारी है  पशु पंक्षियों की दुनिया  मस्त हो विचरते हैँ  इंसानों से नहीं होते हैं  छल कपट प्रपंच से दूर  वे नहीं बनाते हैं  खुद को स्वार्थी  वे होते हैं  सच्चे साथी  मरने तक  नहीं छोड़ते साथ  निभाते हैं एक साथ  काश मैं परिंदा हो जाऊ  इन इंसानों की दुनिया से  दूर चली जाऊँ  क्षितिज पर बना लूँ  मैं बसेरा अपना  आसमां को अपने हाथ से छू आऊं  फिर तोड़ दूँ  ब्रह्मांड को  अपने हाथो से  हर बंधन से दूर हो जाऊँ  मैं भोलेपन को जी लूँ जीभर  सच्चे मन से  नश्वर दुनिया को  दिल से भुला दूँ  सीमा असीम  7, 6, 20

मैं लिखूँ तुम्हें

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सुनो मैं लिखूँ तुम्हें  मैं लिख दूँ हवाओं पर  फूलों भरी डाली से  कि महक जायें फिज़ाएँ  मैं लिखूँ पानी पर  लहरों की लकीरों से   कि होती रहें बरसातें    मैं लिखूँ आसमाँ पर  रंग भर  दूँ नए नए  कि उभर आए इंद्र्धानुष  मैं लिखूँ पेडों पौधों के तनों पर  उकेर दूँ अपने नाम  कि बनी रहे हरियाली  मैं लिखूँ पर्वतों की ऊंची चोटियों पर  अंकित कर दूँ प्रेम चिन्ह  कि हो जाये अमर हमारा प्रेम  सीमा असीम  6,6,20 

मेरी नाराजगी

मैं जब कभी नाराज होना चाहती हूँ  नहीं हो पाती हूँ कि नहीं है  मेरी प्रकृति कभी किसी से नाराज होने की  लेकिन मेरे भोलेपन या कहिए सीधेपन का बदला ले लेती है  प्रकृति  चुन चुन कर एक एक बात का  मेरे दर्द का  मेरे दुख का  मेरे कष्ट का  मेरी तड़प का  मेरी अवहेलना का  मेरी मासूमियत का फायदा उठाने वाले का  वो अपने क्रोध से   हर उस शख्स को  रुला देती है  जिसने मेरे आंसुओं को बहने दिया  कभी मुझे संभाला नहीं  कभी सहारा नहीं दिया  मेरे टूटने पर और तोड़ा  मेरे रोने पर और हंसा  छीन  कर मुस्कान मेरी  मेरा उदासियों से नाता जोड़ा  उसे कभी भी प्रकृति ने चैन से  सोने न दिया  गिन गिन के हमेशा बदला लिया और  लेता रहेगा  मैं नहीं जानती किसी को दुख देना  मैं सदा सुख देना चाहती हूँ  खुशी और मुस्कान भी  नहीं करती मैं परवाह किसी के लिए  क्या दिया उसने मुझे  हाँ मैं कह नहीं पाती हूँ लेकिन  रो लेती हूँ  जी भर के रोती  हूँ मुझे रोना अच्छा नहीं...

मरना नहीं है

जो जीना चाहते हैं उनको मरना पड़ता है  हाँ आजकल तो मरकर  ही जीना पडता है ... मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कि यह जीवन नश्वर है और तुम मेरे लिए सत्य और इस सच को जीने के लिए अपने विश्वास को कायम रखने के लिए मुझे दिन रात तपना होता है किसी भी तरह से अपनी श्रद्धा को बचाए रखना होता है बस इसलिए ही मैं चाहती हूँ कि तुम मुझसे बन जाओ जैसी मैं हूँ वैसे तुम हो जाओ हाँ सागर बनी हूँ गर मैं तेरी चाह में तो तुम नदी सा बन जाओ .... मीठी नदी, कल कल बहती नदी, भरे हुए पानी से गहरी होती हुई नदी ,,,, तुम मुझसे हो जाओ एकदम सच्चे सदा सच्चे ..... सीमा असीम  3,6,20