बातें करने लगता है 
ब्रह्मांड का कण कण 
जो तुम भी नहीं कह पाते 
कभी मुझसे ....
सुनो प्रिय 
             जब मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ लेकिन कह नहीं पाती तब मैं सुनने लगती हूँ तुम्हें   ...जो तुम कहते नहीं मुझसे कभी भी ,,,,वे सब बातें जो कह...ने लगता है ब्रह्मांड का कण कण ,,,पता है प्रिय तुम जो कह रहे होते हो न वो नहीं बल्कि जो तुम नहीं कहते वो बातें गूंजने लगती हैं मेरे आस पास ,,,कैसे और क्यों, नहीं मालूम ,,, लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम्हें ही कहना चाहिए था अपने ही मुंह से मुझे अपनी बाहों में भरकर और कभी गले लगाकर क्योंकि मैं तो तुम्हारी अपनी थी न कोई गैर तो नहीं जो तुम मुझसे अपनी हर बात छिपाते रहे और मुझे दुख दर्द में डाले रहे ,,कितना दुखता है मन, कितना कष्ट पाता है तुम्हें कैसे पता चलेगा क्योंकि मैं तो तुमसे कभी कुछ नहीं कहती, मैं शिकायत भी नहीं करती ,,, न कोई शिकवा करती हूँ लेकिन मेरी आत्मा कहती है चीखती है ज़ोर ज़ोर से और तड़पती है ,,,काश कि तुम सुन पाते, समझ पाते और जानते कि किसी को सताने रुलाने से आप महान नहीं बन जाते, कैसे बनोगे भला जब मेरे आँसू बहते हैं मेरी ही आत्मा को चीर कर ,,,,, 
सुनो प्रिय ... प्रेम करना बहुत सरल होता है और उसे पा लेना भी सरल होता है लेकिन उसे निभाना बहुत मुश्किल होता है बेहद मुश्किल,,,,,, जिसे हर कोई नहीं निभा पाता ! इसके लिए सच्चे दिल और पवित्र आत्मा का होना बहुत जरूरी है जो एकनिष्ठ होकर आपको प्रेम के प्रति समर्पित करके रखती है और आज के दौर में इंसान होना ही मुश्किल है फिर यह सब बातों की अपेक्षा रखना तो एक तरह से मूर्खता ही है जैसे मैं मूर्ख हूँ वैसा हर कोई कहाँ हो सकता है, कैसे हो सकता है लेकिन जो जैसा है वो वैसा ही रहता है उसे बदलना हमाँरे हाथ में नहीं होता है ,हाँ खुद को बदल लेना जरूर अपने ही हाथ में होता है ,,,,,
कैसे मैं प्रेम को बदल लूँ सनम 
कि मुझे तो कुछ आता ही नहीं है 
सीमा असीम 
8,5,20 


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