कविता 

यह क्या हो जाता है मुझे 
क्यों रो पड़ता है दिल 
क्यों बहती हैं आँखें गंगा जमुना की तरह से 
लाख कोशिश कर लो लेकिन 
दिल का दर्द इतना विवश कर देता है कि 
मन को किसी तरह से सकून नहीं आता है 
जो सब्र का बांध बहने लगता है 
जैसे कोई सागर होता है न 
उसमें ज्वार भाटे उठते हैं 
ठीक वैसे ही भर देती हैं 
मेरा मन भी मचलने लगता है 
ज़ोर ज़ोर से दुख की हिलोरे उठती हैं 
और बेचैनी से भर जाता है 
इतनी बेचैनी 
इतनी तड़प 
इतना दर्द 
सच में श नहीं जाता है
और अंखे अविरल बह उठती हैं 
मानों अन्तर्मन को कोई झकझोर रहा है 
मानों कोई ज्वाला सी जल रही है 
और भाव बन कर आँखों से बह रही है 
ऐसा ही हमेशा होता है और मैं मजबूर होकर 
अपने आंसुओं को खामोशी से बहने देती हूँ 
कोई ज़ोर जो नहीं है मेरा इन बहते हुए आंसुओं पर !!
सीमा असीम  
1,5,20 

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