विश्वास

मैं लिखती रहती हूँ विश्वास 
फिर विश्वास क्यों डगमगाता है 
सुख की इच्छा पालती हूँ और 
दुखों की गठरी मिल जाती है 
रो उठती है आत्मा 
इतना दर्द होता है 
जब तुम सच हो तो बताओ 
झूठ कौन है 
अगर तुम झूठ हो फिर 
आखिर सच क्या है 
एक बार तो कहो 
अपने पूरे विश्वास के साथ 
कि हो जाये विश्वास और 
इतना गहरा फिर 
न डगमगाये कभी विश्वास ....सीमा असीम 
12,5,20 

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