सुबह सवेरे

मैं लिख दूँ सुबह सबेरे 
कुछ मुस्कान 
कुछ गीत 
कुछ राग 
और तुम्हें 
हाँ उकेर लूँ तुम्हें 
कभी अपने गीतों में 
शब्दों से 
कभी हथेली में 
लकीरों से 
गाती रहूँ तुम्हें 
गुनगुनाती रहूँ तुम्हें 
तुम सुनो मेरे गीत 
और मिला दो मेरे स्वरों में 
अपने स्वर 
और बन जाये एक लय 
गीतों की और 
हमारे जीवन की ...
.सीमा असीम 
31,5,20 

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