मेरा मन क्यों तुमसे नाराज रहता है
क्यों मेरी मुस्कान रूठी है मुझसे
सुनो प्रिय
मैंने विश्वास किया और सिर्फ तुम पर ही विश्वास किया , तुम्हें ही सच माना तुम्हारी हर बात को आँख मूँद कर माना फिर तुम इतने झूठे और अविश्वासी क्यों निकले आखिर ऐसी कौन सी वजह थी जिसकी वजह से तुम्हें इतना झूठा बनना पड़ा कि तुम मुझसे ही झूठ बोलते रहे , तुम तो खुद को बहुत ही अच्छा इंसान कहते हो न फिर भी हमेशा मुझे छलते रहे मेरे साथ दगा करते रहे लेकिन तुम्हें कोई फर्क भी नहीं पड़ा ! तुम्हें कोई डर भी नहीं लगा कि तुम मेरी सच्चाई के साथ छल कर रहे हो ,, पता है अगर कोई किसी पर विश्वास करता है तो उसके विश्वास की रक्षा करनी चाहिए न , या फिर उसके विश्वास को यूं बिखरा देना चाहिए कि मेरे विश्वास को ही विश्वास न हो कि तुमने क्या कर दिया ! सच में शर्मिंदा हूँ मैं बेहद शर्मिंदा ,, तुम न मेरा मान रख पाये , न ही विश्वास का और न ही मेरे प्रेम का ,,, तुम्हें मैं कैसे माफ करूंगी , मैं चलो कर भी दूँ लेकिन मेरी आत्मा जो बार बार तड़प उठती है वो कैसे माफ करेगी उसे कभी चैन नहीं आयेगा ,,,, तुम्हें सजा तो मिलेगी और जरूर मिलेगी ,,, तुम्हारी सजा सिर्फ यही होगी कि तुमने जो किया है न उसके लिए प्रकृति तुम्हें माफ न करे ,,, कभी न करे ,,,,
कैसे करेगी भला जब तुमने मुझे पल पल रुलाया सताया और तड़पाया है ,,, कभी तो सोचते ,, कभी तो सच्चे बनते ,,,,हे इंसान तुझे मैंने खुदा का दर्जा दिया था और तू इंसान तक न निकला ,,,, इंतिहा कर दी तूने ,,, मेरे दर्द की इंतिहा ,,,, तुझे कभी सकु न आए ,,, कभी आँख की नमी न सूखे और मेरी ही तरह मुझसे बेपनाह मोहब्बत कर बैठे ,,, जा दगा बाज जा ,,,
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