मौसम

मौसम

मुझे नहीं शिकायत मौसम से

न कभी कोई शिकवा

कि यह मौसम तो मौसम ही है

उससे कैसे करूँ कोई गिला

सर्दी गर्मी बरसात ले आने वाला

इन्सानों को सताने वाला

अपनी मर्जी चलाने वाला

चलता रहता अपनी चाल

 

कभी घिर आए बादल तो बरस जाता है

किसी जरूरतमन्द की झोपड़ी को

पानी से भर देता है

कभी निकली चटख धूप

तो झुलसा देता है

सफर में चलते राही को

किसी पेड़ की छाँव को भटका देता है

सर्द रातो को ठिठुराता है

गरीब के पास कंबल ना हो

जागते हुए रात गुजार देता है

 

मौसम नहीं समझता इंसान के मन की भाषा

उसे कहाँ पता होता है कि

बीमार कर रहा है वो इंसान का तन

बहुत स्वार्थी होता है मौसम

करता रहता है मनमानी

उसे नहीं पता होते अपने ही गुनाह

और बेगुनाह को सजा दे देता है  

मौसम बदलता है रूप

यही काम है उसका

आखिर मौसम है तो रंग दिखायेगा ही

अपनी करनी से

सतायेगा ही

 

नादां भोला मन

मौसम की हर मार सहता है

चुपचाप रहता है

ओढ़ लेता है खामोशी की दुशाला

ताउम्र करता है इंतजार

एक दिन तो मौसम भी हो जायेगा

उस जैसा

उसे भी आयेगा उसका ख्याल

फिर नहीं करेगा वो अपने मन की

एक रंग हो जायेगा

मन से मन को मिलायेगा

कर देगा भरपाई उसके दुखों की

सुख की पवित्र राह पर ले जायेगा

मुस्कान से सजेगा चेहरा

रंग निखर जायेगा

तब समझना ईश्वर भी मौसम को माफ कर पायेगा

हाँ माफ कर पायेगा .....

सीमा असीम

15,5,20

 

 


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