जिंदगी का चक्र यूं ही चलता रहेगा
तुमसे मैं क्यो अब गिला करूँ ,,,,
सुनो प्रिय , तुम बस मुझे एक बात बता दो कि अभी और कितना गिरना है तुम्हें और कितनी नफरत भरनी है दिलों में, सच में तुम अपनी आदतें कभी नहीं बदल सकते ,और हाँ तुम बदलना भी मत क्योंकि अगर तुम बदल गए न तो इंसानियत थोड़ी और शर्मसार होने से बच जो जाएगी इसलिए अभी बची खुची इंसानियत को और गिराओ इतना गिराओ कि तुम खुद से कभी नजर ही न मिला पाओ ,,,
मुझे क्या फर्क पड़ता है ॥ क्यों पड़ेगा भला , तुमसे जितना सच्चाई से रिश्ता निभाया तुमने उतनी ही बुरी तरह से हमारे रिश्ते में अविश्वास भर दिया ,,,उफ़्फ़
आँखें खुद ही भर आती हैं और छलक पड़ती हैं ,,तुम कितने गंदे खेल खेलते रहे और खुद को ही सही कहते रहे ,, तुम्हें एक बार भी अहसास तक नहीं हुआ ,, सोचा तक नहीं ,,, मेरे लिए या मेरे बारे में ,,, काश तुम सोचते और तुम मेरी ही तरह से सच्चे होते, एकदम से सच्चे और प्रेम के महत्व को समझते खैर जाने दो तुम क्या समझते ,,, कैसे समझते , तुम्हें तो जीना था ,, मुझे लूटना था खुद को आबाद करने के लिए ,,,,
बताओ मुझे क्या तुम आबाद हुए ? क्या मुझे रुला कर खुद कभी हँसे ? क्या मुझे दुख देकर कभी तुम सकूँ से जी पाये ? बताओ न मुझे बोलो ?
कैसे बताओगे कभी अपनी ही गिरी हुई हरकतें ,,,, कोई तुम्हें जलील कर रहा था न ,, तुम और भी जलील हो रहे थे ,,,
इतना दर्द है दिल में मैं तुम्हें कैसे कहूँ ? तुम रहो ऐसे ही मैं अपने दर्द को दिल में ही छिपाये रहूँगी ,,,क्या करना ,,,
सब ऐसे ही ठीक है न
तुम मेरे हो बस इसलिए ही मैं शर्मिंदा हूँ
तुम सिर्फ मेरे ही रहते तो कोई गम नहीं होता !!!
सीमा असीम
1, 5, 20
तुमसे मैं क्यो अब गिला करूँ ,,,,
सुनो प्रिय , तुम बस मुझे एक बात बता दो कि अभी और कितना गिरना है तुम्हें और कितनी नफरत भरनी है दिलों में, सच में तुम अपनी आदतें कभी नहीं बदल सकते ,और हाँ तुम बदलना भी मत क्योंकि अगर तुम बदल गए न तो इंसानियत थोड़ी और शर्मसार होने से बच जो जाएगी इसलिए अभी बची खुची इंसानियत को और गिराओ इतना गिराओ कि तुम खुद से कभी नजर ही न मिला पाओ ,,,
मुझे क्या फर्क पड़ता है ॥ क्यों पड़ेगा भला , तुमसे जितना सच्चाई से रिश्ता निभाया तुमने उतनी ही बुरी तरह से हमारे रिश्ते में अविश्वास भर दिया ,,,उफ़्फ़
आँखें खुद ही भर आती हैं और छलक पड़ती हैं ,,तुम कितने गंदे खेल खेलते रहे और खुद को ही सही कहते रहे ,, तुम्हें एक बार भी अहसास तक नहीं हुआ ,, सोचा तक नहीं ,,, मेरे लिए या मेरे बारे में ,,, काश तुम सोचते और तुम मेरी ही तरह से सच्चे होते, एकदम से सच्चे और प्रेम के महत्व को समझते खैर जाने दो तुम क्या समझते ,,, कैसे समझते , तुम्हें तो जीना था ,, मुझे लूटना था खुद को आबाद करने के लिए ,,,,
बताओ मुझे क्या तुम आबाद हुए ? क्या मुझे रुला कर खुद कभी हँसे ? क्या मुझे दुख देकर कभी तुम सकूँ से जी पाये ? बताओ न मुझे बोलो ?
कैसे बताओगे कभी अपनी ही गिरी हुई हरकतें ,,,, कोई तुम्हें जलील कर रहा था न ,, तुम और भी जलील हो रहे थे ,,,
इतना दर्द है दिल में मैं तुम्हें कैसे कहूँ ? तुम रहो ऐसे ही मैं अपने दर्द को दिल में ही छिपाये रहूँगी ,,,क्या करना ,,,
सब ऐसे ही ठीक है न
तुम मेरे हो बस इसलिए ही मैं शर्मिंदा हूँ
तुम सिर्फ मेरे ही रहते तो कोई गम नहीं होता !!!
सीमा असीम
1, 5, 20
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