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Showing posts from May, 2019
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न होश है न ही ख्याल  है अपना ज़िंदगी की दौड़ में दिन गुजरते हैं सुनो प्रिय             ज़िंदगी के तमाम दुखों सुखों के बीच दिन निकल रहे हैं खुद का होश रहता ही नहीं है बस बेजान जिस्म के साथ यूँ ही जी रहे हैं जैसे अशोक वाटिका में सीता जी उन अनंत अशोक पेड़ों की छाया में अपने दिन गुजर रही थी उनके साथ कई राक्षस साथ थे किन्तु मेरे साथ सब प्रिय जन हैं स्वजन हैं जो हर तरह से मेरा ख्याल रखते हैं किन्तु मैं बावरी अपनी सुध बुध बिसराये बस खोई रहती हूँ दर्द बहाती हूँ आँखों से और खाने पीने से बेखबर तुम्हारी दुनिया में खोई रहती हूँ जानती हूँ मेरे यूँ दुखी होने से तुम्हे भी कष्ट होता होगा लेकिन क्या करें इस तड़पते हुए दिल को किस तरह से समझाएं , किस तरह से तसल्ली दें और किस किस तरह से ढांढस बँधायें कि यह किसी हाल न समझता है न ही शांत होता है दुनिया की साडी खुशियों के बीच मैं उस अथाह दर्द और तकलीफ को सह रही हूँ जिसका कोई भी इलाज नहीं है कोई भी सकूँ नहीं है आज मंदिर किस तरह से आँखों से आंसू बह रहे थे जो किसी भी  रोके नहीं  जा रहे थे आरती पूजा के बीच मैं अपनी हिचक...
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चलो सनम किसी ऐसे जहाँ में जहाँ हो सिर्फ तेरी बाहों के साये। .. सुनो प्रिय          आज रात भर तेरा ही ख्याल मन पर हॉबी रहा कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे हम कभी मिलेंगे ? कैसे हम कभी एक दूसरे को रूबरू देखेंगे ? कैसे हम संग संग कुछ कदम चलेंगे ? सच में बड़ा मुश्किल है बेहद मुश्किल ,,,जिसका नाम हरवक्त लबों पर है और जो सीने  में धड़कन बनकर धड़कता है उससे कभी रूबरू मिलने को मिलेगा ? क्या उसे अपने तड़पते हुए दिल से लगाने को मिलेगा ? पता नहीं शायद रब की मर्जी के आगे सब कुछ नामुमकिन है अगर रब चाहें तो हमें पल भर में मिला दे या उसकी मर्जी नहीं है तो सदियों उसके इन्तजार में यूँ ही गुजर जाएँ ,,,,सनम मेरे माहि कि तेरी चाहत में खोकर मैंने सब भुलाया है तो ो मेरे खुदाया उसे मुझसे एक बार तो मिला जिससे मेरे मन को सकूँ आ जाए और खोया करार लौट आये मैं तुमसे सब गीले शिकवे शिकायते कहकर खुद को हल्का कर लू ,कह दू या वो सब जो  कुछ  भी हमारे दिल में है ,,,,सनम तेरे लिए ही अब जीने की चाहत है और अब यह चाहत ही मेरे का दर्द बन गयी है न कहने का मन होता है कभी कुछ किस...
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गुजर जाती हैं रातें यूँ ही याद करते हुए अश्क ठहरे रहते हैं आँखों में सनम ,,, सुनो प्रिय               तुम्हें याद नहीं करती हूँ लेकिन तुम याद रहते हो, जितना करती हूँ कोशिश भुलाने की तुम याद आते हो, मैं कैसे काट लेती हूँ सारी रात तुम्हें अपने यादों का साया बनाये, अपने में समेटे लपेटे हुए, मुझे खुद भी याद नहीं रहता, हाँ बस इतना जरूर याद रहता है कि तुम मेरी यादों में रहते हो, एक दिन हम मिलेंगे इस ख्वाहिश में रात और दिन गुजरते रहते हैं लेकिन कब ?  नहीं जानती,  क्या तुम्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं होता है कि तुम मेरी भावनाओं के साथ गलत कर रहे हो ?     लेकिन मैं तुम्हें कुछ भी कहना नहीं चाहती क्योंकि मैं समझती हूँ कि अगर मैं तुम्हें कुछ कहूँगी तो तुम्हें नहीं खुद को कहूँगी बस यही ख्याल मुझे चुप रहने को मजबूर कर देता है , हाँ मैं भी चुप रहूंगी, एकदम से चुप लेकिन मेरे सनम तुम इतने खामोश कैसे रह लेते हो ? किस तरह से ? बताओ मुझे ? क्या तुम्हारे पास दिल नहीं है?  धड़कन नहीं है ? भाव नहीं विचार नहीं है?  य...
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पुकारता रहा रोम रोम आत्मा दर्द से सिहरती रही बहता रहा आँखों से लहू कोई सदा तुम तक पहुंची या नहीं सुनो प्रिय नहीं जानती मैं कि क्यों मेरी आँखों से लहू बहता रहा, दिल दर्द से  रोता  रहा, क्या पता तुम तक मेरी आवाज गयी या नहीं या आत्मा की आवाज आत्मा में ही दब घुट कर मर गयी ,इस दर्द को सहना नामुमकिन है किन्तु सह रही हूँ और जी भी रही हूँ इस तरह से जैसे जीवन नहीं है मुझमें कोई बेजान सा जिस्म सा है जिसे मैं घसीट रही हूँ न कितना भारी बोझ अपने सर पर उठाये फिर रही हूँ, सोचती रहती हूँ कि तुम ऐसे कैसे हो ?क्यों हो ? क्या तुम्हारे पास दिल नहीं है अगर है तो फिर पत्थर का ही होगा ,या फिर मुर्दा दिल होगा ,जो सब जानकर भी समझ नहीं पाता होगा , कितने आंसू बहे सारी रात और कितना दर्द उठा ,,,तुम्हें कैसे समझ आएगा, जब तुम बेपरवाह  हो गए ,,,,,,जानते हो सनम, यह प्रेम की पुकार है और दिल से दिल तक जाती जरूर है लेकिन तुम मनमानी करना चाहते हो, तो करते रहो मन मानी कोई बात नहीं बस इतना ख्याल रखना प्रिय हमें वही सबकुछ वापस मिल जाता है जो हम किसी को देते हैं चाहे मान सम्मान हो ,प्यार हो , इशक हो या दर्द ...
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ख़ुशी में  बज उठे दिल के तार कहनी थी जो दिल की बात वे सब उनसे कहने लगी। ...... चमक  हुई आँखों में ह्रदय में मोर नाच उठा कि सनम तुमसे सब बातें दिल की अब कहने जो लगी हूँ ,मन कितना हल्का फुल्का सा हो गया है, मानों हवा में उड़ता हुआ सा, अब दिल में कोई भेद ही नहीं मैं अब जैसी भी हूँ बस ऐसी ही हूँ कभी कोई दुराव नहीं कोई छल नहीं, निरमल जल सा बहता हुआ साफ ह्रदय जिसमें बस हो तुम, अपना डेरा बनाकर, उसमें तुम निरंकुश तैरते रहो सुख सागर में जैसे विष्णु भगवन बिराजते हैं ठीक वैसे ही तुम आराम की मुद्रा में रहो और मुझे यूँ अपने चरणों की तरफ बैठा रहने दो, तुम करो जग की हर रीत पूरी मुझे बस तुमसे प्रीत करने दो , सच में आज कितने दिनों के बाद मन को सकूँ सा आया था, बह रही थी दर्द से जो आँखें अब ख़ुशी से बह रही थी, मैंने अपने दिल की बातें तुम्हारे दिल से कह दी और हर चिंता से मानों दूर हो गयी अब हर तरफ तुम हो सिर्फ तुम ,,,जैसे हर अक्स में तुम बस गए हो, हर कण में तुम चमक उठे हो, जैसे नभ में चमकते हुए सूर्य तारे चाँद और सरे गृह सिर्फ तुम बन गए हो, अब तुम रहो कहीं भी हो सिर्फ मेरे और मेरे पास।   ...
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कह दी आज उनसे दिल की हर बात दिल खाली खाली सा क्यों है  सुनो प्रिय न चाहते हुए भी आज दिल की हर बात उनको कहनी पद गयी क्या करें दर्द ही इतना था कि सहा नहीं जा रहा था रो रो कर आँखें सूज गयी थी आखिर दिल खोल कर रख दिया अब चाहें तो वे हमें जो समझे समझने दो क्या फर्क पड़ता है उन्हें भी शायद ख़ुशी ही मिली हो तड़पते हुए दिल को शायद रहत ही मिली हो कितना तड़पा था दिल उनसे जुड़ा होकर ,कितना मचल रहा था मानों आग में जल रहा हो जैसे झुलस के कला पद गया हो या जलकर राख में तब्दील हो गया हो ,और ताप इतना कि  जिस्म आग का अंगारा बन गया हो ,यह इश्क की तड़प ,यह इश्क की आग कहीं जलाकर खाक न कर दे लेकिन जो भी करे कर दे इस तकलीफ से छुटकारा भी तो नहीं है क्योंकि हमने जान बुझ कर तो लगायी नहीं है ये लगाए न लगे यह बुझाये न बुझे आह यह इश्क मुझे इस कदर तनहा कर देगा सोचा न था ,सनम क्या कहूं कि मैं तुमपर मर मिटी हूँ और तुम्हारी हर बात मुझे प्यारी लगती है तुम जैसे भी हो जो भी हो मुझे स्वीकारे हो मेरे दिल पर राज करने वाले मेरे प्रिय तुम  भी तो यूँ ही कभी तड़पते होंगे दर्द में मचलते होंगे फिर भी कैसे मन को वश में ...
 पिघल रहा है मन और अश्क बाह रहे हैं न जाने क्यों न जाने क्यों। . सुनो     मुझे सच में समझ नहीं आ रहा है कि आज ऐसा क्यों हो रहा है क्यों दर्द बहे जा रहा है जितना संभाला चाहती हूँ मन उतना और पिघलता जा रहा है ,सुबह से ही मन उदास और जिस्म बेजान सा है न चल रहे हैं हाथ पांव न ही दिमाग काम कर रहा है सनम तुम बहुत याद आ रहे हो बेहद  बेइंतिहा ,,,,जैसे नदी अपने तट बांधों को तोड़ कर दौड़ जाना चाहती हो ,,,,,,सनम जिंदगी में इतना दर्द  क्यों होता है,,, या वे लोग ही हमें दर्द क्यों देते हैं जिनको हम अपना समझ लेते हैं या अपना समझने की भूल करते हैं शायद दुनिया में कोई भी अपना होता ही नहीं है हम खुद तक अपने नहीं होते हम सिर्फ अपनी सांसे पूरी करते हैं अपने लिए जीते हैं और अपने लिए ही मर जाते हैं लेकिन मैं ऐसा नहीं सोच पति मैं उनको ख़ुशी देना चाहती हूँ हर तरह से जो मेरे हैं जो मेरे  और पूरी  कोशिश भी करती हूँ लेकिन हमारे हाथ में आता है उन सबका बेदर्द स्वाभाव जो तकलीफ देता है बहुत दर्द देता है इतना कि मैं अपना पेट पकड़ कर जोर जोर से चीखना चाहती हूँ चिल्लाना चाहती हूँ और पूछ...
कोई भी परवाह नहीं है इस दुनिया की तल्खियों की हूँ मासूम परिंदा सा मैं। ..  सुनो प्रिय  यह सच है कि  मेरा मन किसी मासूम बच्चे की तरह से निर्दोष है इतना सरल और सच्चा जैसे किसी नए जन्में बच्चे का होता है एकदम से सच्चा ,यही सच है प्रिय क्योंकि मुझे इस दुनिया में किसी से न कुछ लेना है और न ही अपने साथ लेकर जाना है जो जैसा है वो वैसा ही प्यारा है लेकिन न जाने क्यों कभी कभी दिल बहुत उदास और परेशां हो जाता है तब जी चाहता है कि फुट फुट कर खूब रो लो बहा दो सारा दर्द और खुद को खली करलो और पुकार लूँ तुम्हें अपनी आत्मा की गहराइयों से आवाज लगते हुए ,,, क्या तुम जानते हो प्रिय कि  दिल तुम्हें क्यों चाहता है मुझे तो नहीं पता है बस तुम्हारे दर्द में आँखें भर आती है और तुम्हारी ख़ुशी में मन मुस्कुरा देता है क्योंकि मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूँ तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी खुशियां हैं और दुःख भी। ..सुनो सनम कितना प्यारा संसार था हमारा जहाँ खुशियां थी सुखं थे प्रेम था लेकिन तुम जाने किस छह में फंस गए और बेहद प्यारी बेहद खूबसूरत दुनिया बदसूरत सी लगने लगी दर्द के स...
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सुनो प्रिय                जी चाहता है कि मैं तुम्हें फोन करूँ पूछ लूँ तुमसे एक एक बात लेकिन फिर  दिल  भर आता है तुम्हारी कही बातों को याद करता है और तुम्हारा नो डाइल  करती हुई मेरी उँगलियाँ थम जाती हैं मैं रुक जाती हूँ  सबकुछ  वक्त के हाथों छोडकर शांत होकर बैठ जाती हूँ कि अब जो भी होगा अच्छा ही होगा जब तुम्हें मेरा ख्याल नहीं आता एक बार भी तुम्हारे मन में मेरा नाम नहीं आता तो फिर क्या फायदा कुछ भी कहने या सुनने का जब तुम्हें समझ आएगी तभी तुम भी समझ लोगे हर बात क्योंकि तुमने मुझे अपनी पत्नी बनाया है और क्या तुम जानते नहीं कि पत्नी की कितनी जिम्मेदारियां होती हैं लेकिन तुम्हें क्या फर्क पड़ता है  तुम जो मन आये वो करो क्योंकि तुम तो आजाद ख्याल इंसान हो न तुम्हारी खुद की यह आजादी ही तुम्हें यूँ  डिप्रेशन में  ले जा रही है कभी सोचा है मेरे बारे में कि  मैंने तुम्हारे लिए खुद को मिटा दिया तुम्हारी ख़ुशी के लिए खुद को ख़त्म कर दिया पर तुम्हें क्या मैं जी  मर रही हूँ कभी  मेरी आँख के आंसू बहते बहत...