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मेरी ऑंखें

 मासूमियत से भरी   मेरी आंखों में   है थोड़ी सी नाराजगी  या यूँ कहें छाई है उदासी  या फिर कोई शिकायत  जो करना चाहती है अपनों से ही   वह चाहती है जीतना खुद से ही   सपनों के आकाश को   जो नहीं है उसकी पहुंच में उसे भी   ताकि मुरझाई मुरझाई सी आंखों में  भर जाये थोड़ी ख़ुशी  जुगनू सी चमकती चमक.. क्यों छाई है इतनी बेबसी  मुश्किल तो नहीं है कुछ भी  क्यों थक कर चूर हो गई है अभी से   भटकना नहीं  तलाशना है   तराशना है और   पूरा कर लेना है हर ख्वाब अपना   हर यकीन को पा लेना है  प्रेम के क्षितिज पर  घरौंदा बनाकर  मुठ्ठी में भर लेना  अपना आसमां ..... सीमा असीम  14,10,24   प्यारी निधि आपके लिए ❤️
 वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार... वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार  चाँदनी रातों में  जब चाँद खिड़की से झाँकता होगा  सुनहरी रौशनी में उसे भिगोता होगा  तब वो लेता होगा मुझे पुकार  बार बार  हर बार... वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार... रात को थककर  जब कभी वो सोता होगा  सुबह उठकर  आँखें भिगोता होगा  कितनी बेचैनी से  तपड़ता होगा  घबराकर होता होगा बेजार  बार बार  हर बार  वो भी करता होगा यूँ  मेरा इंतजार  जिसके लिए मन मेरा  है बेकरार  सीमा असीम  13,10,24

हिंदी कविता

 कुछ बदला बदला सा लगता है क्या समय बदला है  क्या मौसम बदला है  या मैं बदल गयी हूँ.. तुम्हें याद न करके भी  अब दिन रात याद कर रही हूँ  वो कड़वाहट जो मन में घुली थी  सब मिट गयी है  अब मीठी मीठी सी  मिठास से मैं भर रही हूँ.. क्या तुम मुझे किसी जादुई नशे में  भिगोने को छड़ी घुमा रहे हो  या मैं खुद ही नशे में  चूर हो रही हूँ.. समझ नहीं आता है फिर भी  कोशिश करती हूँ समझने की  या जानबूझकर  मैं और नासमझ हो रही हूँ.. करो कुछ ऐसा ईश्वर कि  हो जाये चमत्कार कोई  यह मैं अपनी आत्मा से  गुजारिश कर रही हूँ.   दिन तो बदलते हैं एकदिन  किसी के भी  मैं तो एक सच्ची इंसान हूँ  फिर क्यों इतना परेशान हो रही हूँ.. तुम जानो अपनी  हो कैसे इंसान तुम  मैं तो अग्नि में तपकर  एकदम खरी हो रही हूँ.. सीमा असीम  12,10,24
 मौसमों का अब मेरे मन पर कोई असर नहीं होता है  मेरा मन तो बस एक मौसम में ही खोया रहता है   सावन के अंधे को दिखती है हरियाली चारो तरफ  प्रेम में डूबा हुआ मेरा मन प्रेम में ही रमा रहता है   बड़े नादा है जो उठा देते हैं उंगली सामने वाले की तरह  समझते ही नहीं है कि उठी है तीन उंगलियां मेरी तरफ  सीमा असीम  24,9,24

प्रेम है मुझे...

 जब होती बार बार बारिश तो  भीगे हुए फूलों को देखते हुए  हरियाली के पास से गुजरते हुए  अक्सर यही तो सोचती हूं मैं  यूं ही नहीं होती है यह बारिश   कहीं तुम मुझे याद करके रोते हो   करते होंगे गुहार आसमा से और  बादलों के संग बरस पढ़ते होंगे   तभी तो मुस्कुरा देता है मेरा भी मन कभी-कभी   रुक जाए बारिश और तुम भी मुस्कुरा दो   पोंछ कर अपनी नम आंखों को ख़ुश हो जाओ  कि जरूरी है इस अहसास को महसूस करना  जीने के लिए अपनी भावनाओं को कहना  नहीं तो घुट जाओगे मन ही मन  कोई नहीं समझेगा तुम्हे  न तुम्हारे जज्बातो को  कहो और कहते रहो  कि प्रेम है मुझे  हाँ प्रेम है मुझे  तुमसे ही सिर्फ  तुमसे ही..... सीमा असीम  18,9,24

जिस तरह तैरती हैं पानी में....

 जिस तरह से तैरती है पानी में मछलियां   ठीक उस तरह से तुम मेरी आंखों में तैरते हो   याद ना करना चाहूं तो भी तुम   हर वक्त मेरी यादों में रहते हो   यूँ कम तो नहीं हैं मेरी भरी भरी आंखें  किसी नदी से   जहां तुम दिन रात अठखेलिया करते हो   आ जाओ कभी तो रूबरू मेरे सपनों के  राजकुमार की तरह घोड़े पर सवार होकर   या कभी चले आओ यूँ ही चहलकदमी करते हुए   और मेरी पलकों पर हाथ रख दो   अगर घबरा जाऊं मैं तो समेट लो मुझे अपनी बाहों में  और मुझे अपने प्रेम से तर बतर कर दो   यह सब ख्याल यूं ही तो नहीं आते मेरे मन में  गूंजती है कोई सदा ब्रह्मांड में   तो जोड़ देती है हमें आपस में   और यू शब्द उतर जाते हैं  कागज पर.... सीमा असीम  17,9,24

जाने क्या क्या करते होंगे

 जब तुम मुझे याद करते होंगे ना जाने क्या-क्या सोचते होंगे या कभी मुस्कुरा देते होंगे या कभी रो देते होंगे   सबसे छुपा कर पोछ लेते होंगे अपनी नम ऑंखें और अपनी मुस्कान को सबके पास बिखेर देते होंगे   न जाने तुम क्या करते होंगे जब तुम मुझे याद करते होंगे  गुजरे लम्हों की एकएक बात को किसी फिल्म की मानिंद देखते होंगे या किसी किताब के पन्ने पलटते हुए पढ़ते होंगे   जब तुम मुझे याद करते होंगे ना जाने क्या क्या करते होंगे   जब होते होंगे अकेले तो आंखों से आंसू किसी बारिश की मानिंद झरते होंगे या सावन की रिमझिम रिमझिम फुहारों से बरसते होंगे   सब कुछ कहने को दीवार से सट कर बैठते होंगे तुम ना जाने दीवारों से कैसे बातें करते होंगे ना जाने क्या क्या करते होंगे  यादों के झुरमुट से गुजरते हुए तुम मुझे शीतल साया सा अनुभूत करते होंगे  न जाने क्या क्या करते होंगे.... सीमा असीम  15,9,24