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तू जब आता है

 रात भर तुम्हें याद करते रहे दर्द से हम तड़पते रहे भिगोते रहे अपनी पलकों को हम दिल को हाथों से अपने मसलते रहे नींद भी आँखों से गायब हुई ख्वाब में मिलने को तरसते रहे तू आयेगा लौटकर जब जालिमा तब तक हम जीते मरते रहे यूँ क्या कहूँ तुझको तू ही बता अगन में अपनी बस सुलगती रही...

दुआ

 हंसते चेहरे को रुलाने वाले  दर्द से सारी रात जगाने वाले  कहां बदलेंगे तेरी आदतें चाहे कुछ भी हो  मगरूर खुदा के खौफ से भी ना डरने वाले  एक दिन तो तेरी अकल में सब आएगा  देख उस दिन तू हाथ मलता रह जाएगा  कुछ भी बचा नहीं होगा तेरे पास में  इस आह का कोई तो अंजाम आएगा  अपनी सहूलियत से हर रिश्ते को निभाने वाला  तेरा मुक़द्दर ही तुझे धोखा दे जाएगा  कब तक तू दूसरों को बुरा खुद को भला कहेगा भला  मेरे दर्दे दिल को कभी तो आराम आएगा   एक ही पल में दुनिया को उजाड़ने वाला   तेरा हर आसरा एक दिन गुजर जाएगा  दिल में सिर्फ दुआ ही दुआ थे तेरे लिए  कुछ दिल को तड़पा कर सताकर रुलाने वाले  एक दिन तू भी मेरे दर्द से बेजार हो जाएगा  मांगता फिरेगा पनाह चारों तरफ  तू एक बूंद पानी को तरस जाएगा  यह दुआएँ अगर कबूल करेगा मेरे ईश्वर  तो मेरा दिल और भी तड़प जाएगा  वो जैसा भी है है तो मेरा ही  वो जरूर एक दिन यह बात समझ आएगा.... सीमा असीम 
 अगर तुम दर्द की कीमत समझते अगर तुम जानते कि दर्द क्या होता है तो तुम कभी भी दर्द नहीं देते इतना बेतहाशा दर्द कि अगर जान भी निकल जाए तो कम है लेकिन तुम कहां समझोगे तुम कैसे जानोगे भला? तुम तो अपनी खुशी में खुश होना अपनी दुनिया में खुश, एक बात याद रखना तड़पती हुई आत्मा की आह निकलती है तो वह सात समुंदर पार जाती है सारे आसमानों को चीर के रख देती है, तू अपनी आवाद दुनिया में खुश है ना, देखना तेरी दुनिया आवाद नहीं रहेगी ....

सिर्फ मेरे हो तुम

 हां याद करती हूं तुम्हें  तुम भी वहां याद करते होगे मुझे  मेरा तो रोम-रोम पुकार ने लगता है तुम्हारा नाम  जरूर तुम भी मुझे आवाज देते होगे वहाँ  पल पल प्रतिपल  सिर्फ तुम्हारा ख्याल तुम्हारा नाम  और कुछ भी नहीं ऐसे  दुनिया में हो कर भी दुनिया की नहीं मैं जैसे  कभी यूँ ही याद करते रो लेना  कभी यूं ही याद करके मुस्कुरा लेना  कितनी मधुर स्मृतियां है हमारे तुम्हारे बीच  कई जन्मों तक याद करती रहूंगी फिर भी पूरी नहीं होगी  इन स्मृतियों में खोकर  कब गुजर जाते हैं दिन रात  कई जन्म भी गुजर जाएंगे यूं ही  पहाड़ों की ऊंची नीची गोल घुमावदार सड़कों पर चलते हुए  कितने ख्वाब बुने थे हमने  कभी हाथों में हाथ डाल  कभी आंखों में आंखें डाल  तुम्हारा वह मुस्कुराता हुआ चेहरा  तुम्हारा कभी नाराज हो जाता हुआ गुस्सा करता हुआ वह चेहरा  कुछ भी तो नहीं आंखों से दूर जाता मेरे पल भर को भी  शायद तुम भी  यूँ ही याद करते होगे मुझे  किस सिर्फ अकेले में ही नहीं चल रही हूं इस बिरहा की अगन में ...
दिलबर के सोने के बाद भी मन को शांति नहीं मिलेगी मन में बहुत सारी बेचैनी बहुत सारी तड़क-भड़क रही थी तो क्या करे खुद को खत्म कर ले लेकिन क्या खत्म करने से समस्याओं का समाधान होगा जीते जी जो चीजें हम सही कर सकते हैं क्या मरने के बाद हम कर सकते हैं वरना तो चने के झाड़ पर में मर सकते हैं लेकिन जो मरने के बाद तकलीफ है परेशानियां हमारे साथ रहेंगे उसे रोक नहीं पाएंगे कैसे पाएंगे  तभी उसने अपनी आंखों को बहते हुए आंसू को हाथों से पूछा और उठ कर खड़ी हो गई रोना तो किसी भी समस्या का समाधान नहीं है बल्कि हम अपनी आंखों को रो-रो कर खराब कर लेते हैं उसके बाहर आई और राज के पास जाने के पहले कदम उसी तरह पढ़ा दिए देखा आज खाना खाने के बाद उसका हाथ धो रहे हैं जाना ही पड़ेगा बात करनी ही पड़ेगी आखिर वो राज के बिना कैसे रहेगी रास्तों उसकी जान है 
 गौर से देखने पर पता चलता है कितना भयानक है इस झूठी दुनिया का सच्चा चेहरा, मैं बेतहाशा डर जाती हूं घबरा जाती हूं और सोते से उठकर बैठ जाती हूँ दिल तड़प  जाता है मेरा, बेतहाशा आँसू बहते हैं और चैन नहीं आता,, समझ नहीं आता क्या करूं? क्यों है दुनिया का ऐसा चेहरा, क्यों किसी के दिल में जरा सर दर्द नहीं होता, इतने मतलबी इतने स्वार्थी इतने धोखेबाज क्यों है दुनिया में लोग?  हे ईश्वर मैं जानना चाहती हूं, मुझे बताओ? क्यों धोखा करते हैं लोग? क्यों किसी के साथ छल करते हैं लोग? क्यों किसी को लूट लेते हैं लोग? क्यों किसी को बर्बाद कर देते हैं लोग?  क्या उन्हें रत्ती भर भी एहसास नहीं होता है? क्या उन्हें कोई भी तकलीफ नहीं होती? क्या उन्हें कोई भी सजा नहीं मिलती?क्यों   आखिर क्यों?
मोहित ने उस लड़की को देखा और मानो जैसे उसकी तपस्या पूरी हो गई उसका ध्यान गुरु ग्रंथ साहिब की तरफ नहीं था उसका ध्यान तो सिर्फ उसका कि की तरह ही था और वह आया भी इसी वजह से ही ठाकुर द्वारे में वरना शायद ही गुरुद्वारे में आता और आता भी तो किसी भी समय आकर मत्था टेक कर चला जाता है ऐसे नियम से सुबह या शाम दोनो टाइम शायद ही आता क्योंकि वह तो कभी मंदिर तक नहीं गया मम्मी कितना कहती रहती हमेशा मंगलवार का व्रत रख लो मंगलवार को मंदिर चले जाया करो लेकिन कभी भी नहीं गया और आज यहां पर अचानक से उसके मन में श्रद्धा पैदा हो गई शायद उस लड़की को देखकर ही मन में श्रद्धा जागृत हुई और जब मन में श्रद्धा जागृत हो जाती है तो सब कुछ बहुत अच्छा लगने लगता है सब कुछ एकदम सच्चा लगने लगता है एक मन में लगन पैदा हो जाती है एक भाव पैदा हो जाता है एक तरीके से मन जागृत हो जाता है जो मन सोया पड़ा होता है वह जागृत अवस्था में आ जाता है उसके साथ भी ऐसा ही तो कुछ हुआ आरती होने के बाद में प्रसाद बांटा गया और प्रसाद लेकर मत्था टेककर हूं बाहर आ गया कि अभी तक बिल्कुल खामोश थी उसके साथ में एक दो लड़कियों और भी थे लेकिन वह किसी से बो...