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सुबह सवेरे

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मैं लिख दूँ सुबह सबेरे  कुछ मुस्कान  कुछ गीत  कुछ राग  और तुम्हें  हाँ उकेर लूँ तुम्हें  कभी अपने गीतों में  शब्दों से  कभी हथेली में  लकीरों से  गाती रहूँ तुम्हें  गुनगुनाती रहूँ तुम्हें  तुम सुनो मेरे गीत  और मिला दो मेरे स्वरों में  अपने स्वर  और बन जाये एक लय  गीतों की और  हमारे जीवन की ... .सीमा असीम  31,5,20 
मेरा मन क्यों तुमसे नाराज रहता है  क्यों मेरी मुस्कान रूठी है मुझसे  सुनो प्रिय             मैंने विश्वास किया और सिर्फ तुम पर ही विश्वास किया , तुम्हें ही सच माना तुम्हारी हर बात को आँख मूँद कर माना फिर तुम इतने झूठे और अविश्वासी क्यों निकले आखिर ऐसी कौन सी वजह थी जिसकी वजह से तुम्हें इतना झूठा बनना पड़ा कि तुम मुझसे ही झूठ बोलते रहे , तुम तो खुद को बहुत ही अच्छा इंसान कहते हो न फिर भी हमेशा मुझे छलते रहे मेरे साथ दगा करते रहे लेकिन तुम्हें कोई फर्क भी नहीं पड़ा ! तुम्हें कोई डर भी नहीं लगा कि तुम मेरी सच्चाई के साथ छल कर रहे हो ,, पता है अगर कोई किसी पर विश्वास करता है तो उसके विश्वास की रक्षा करनी चाहिए न , या फिर उसके विश्वास को यूं बिखरा देना चाहिए कि मेरे विश्वास को ही विश्वास न हो कि तुमने क्या कर दिया ! सच में शर्मिंदा हूँ मैं बेहद शर्मिंदा ,, तुम न मेरा मान रख पाये , न ही विश्वास का और न ही मेरे प्रेम का ,,, तुम्हें मैं कैसे माफ करूंगी , मैं चलो कर भी दूँ लेकिन मेरी आत्मा जो बार बार तड़प उठती है वो कैसे माफ करेगी उसे कभी चैन नहीं आयेगा ...

मौसम

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मौसम मुझे नहीं शिकायत मौसम से न कभी कोई शिकवा कि यह मौसम तो मौसम ही है उससे कैसे करूँ कोई गिला सर्दी गर्मी बरसात ले आने वाला इन्सानों को सताने वाला अपनी मर्जी चलाने वाला चलता रहता अपनी चाल   कभी घिर आए बादल तो बरस जाता है किसी जरूरतमन्द की झोपड़ी को पानी से भर देता है कभी निकली चटख धूप तो झुलसा देता है सफर में चलते राही को किसी पेड़ की छाँव को भटका देता है सर्द रातो को ठिठुराता है गरीब के पास कंबल ना हो जागते हुए रात गुजार देता है   मौसम नहीं समझता इंसान के मन की भाषा उसे कहाँ पता होता है कि बीमार कर रहा है वो इंसान का तन बहुत स्वार्थी होता है मौसम करता रहता है मनमानी उसे नहीं पता होते अपने ही गुनाह और बेगुनाह को सजा दे देता है   मौसम बदलता है रूप यही काम है उसका आखिर मौसम है तो रंग दिखायेगा ही अपनी करनी से सतायेगा ही   नादां भोला मन मौसम की हर मार सहता है चुपचाप रहता है ओढ़ लेता है खामोशी की दुशाला ताउम्र करता है इंतजार एक दिन तो मौसम भी हो जायेगा उस जैसा उसे भी आयेगा उसका ख्याल फिर नही...

विश्वास

मैं लिखती रहती हूँ विश्वास  फिर विश्वास क्यों डगमगाता है  सुख की इच्छा पालती हूँ और  दुखों की गठरी मिल जाती है  रो उठती है आत्मा  इतना दर्द होता है  जब तुम सच हो तो बताओ  झूठ कौन है  अगर तुम झूठ हो फिर  आखिर सच क्या है  एक बार तो कहो  अपने पूरे विश्वास के साथ  कि हो जाये विश्वास और  इतना गहरा फिर  न डगमगाये कभी विश्वास ....सीमा असीम  12,5,20 
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बातें करने लगता है  ब्रह्मांड का कण कण  जो तुम भी नहीं कह पाते  कभी मुझसे .... सुनो प्रिय               जब मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ लेकिन कह नहीं पाती तब मैं सुनने लगती हूँ तुम्हें   ...जो तुम कहते नहीं मुझसे कभी भी ,,,,वे सब बातें जो कह...ने लगता है ब्रह्मांड का कण कण ,,,पता है प्रिय तुम जो कह रहे होते हो न वो नहीं बल्कि जो तुम नहीं कहते वो बातें गूंजने लगती हैं मेरे आस पास ,,,कैसे और क्यों, नहीं मालूम ,,, लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम्हें ही कहना चाहिए था अपने ही मुंह से मुझे अपनी बाहों में भरकर और कभी गले लगाकर क्योंकि मैं तो तुम्हारी अपनी थी न कोई गैर तो नहीं जो तुम मुझसे अपनी हर बात छिपाते रहे और मुझे दुख दर्द में डाले रहे ,,कितना दुखता है मन, कितना कष्ट पाता है तुम्हें कैसे पता चलेगा क्योंकि मैं तो तुमसे कभी कुछ नहीं कहती, मैं शिकायत भी नहीं करती ,,, न कोई शिकवा करती हूँ लेकिन मेरी आत्मा कहती है चीखती है ज़ोर ज़ोर से और तड़पती है ,,,काश कि तुम सुन पाते, समझ पाते और जानते कि किसी को सताने रुलाने से आप महान नही...
कैसे आयेगी मुझे चतुराई  अगर आ भी गयी तो क्या हो जायेगा .... जब भी दुनिया की तरफ नजर जाती है तो सोचती हूँ कि यह दुनिया सिर्फ चतुर लोगों के लिए ही है वही इस दुनिया में जी पाते हैं ,,, वही दुनिया से कुछ छीन पाते हैं ...किसी न किसी प्रकार से वे दुनिया को अपने वश में  करने का प्रयास करते रहते हैं और फिर सोचते हैं कि हमसे ज्यादा चतुर और चालक कोई भी नहीं है लेकिन वे भूल जाते हैं कि चालाक और चतुर कौआ भी होता है ,,,हमेशा अपनी चतुराई के लिए जाना जाता है अपने अंडे भी कोयल के घोसले में पलवा लेता है लेकिन आखिर में खाता है गू ही ! उससे ही अपना पेट भरता है और अपनी चालाकी के लिए पूरी दुनिया में बदनाम भी हो जाता है खैर क्या करना जिसे जैसे जीवन जी मिले उसे उसी तरह से जी लेना चाहिए लेकिन इन चतुर और चालाक लोगों से सीधे और सरल लोगों को बहुर दुख और दर्द होता है ...इतना कष्ट कि सहा नहीं जाता मानों आत्मा ही छलनी हो जाती है पर क्या करें वे कुछ नहीं कर सकते सिर्फ रोने और खुद को ही तकलीफ देने के .... खैर दिन तो सीधे और सरल लोगों के भी आते ही हैं और जरूर आएंगे बस यही उम्मीद और आस जीने का माध्यम बन ...
कविता  यह क्या हो जाता है मुझे  क्यों रो पड़ता है दिल  क्यों बहती हैं आँखें गंगा जमुना की तरह से  लाख कोशिश कर लो लेकिन  दिल का दर्द इतना विवश कर देता है कि  मन को किसी तरह से सकून नहीं आता है  जो सब्र का बांध बहने लगता है  जैसे कोई सागर होता है न  उसमें ज्वार भाटे उठते हैं  ठीक वैसे ही भर देती हैं  मेरा मन भी मचलने लगता है  ज़ोर ज़ोर से दुख की हिलोरे उठती हैं  और बेचैनी से भर जाता है  इतनी बेचैनी  इतनी तड़प  इतना दर्द  सच में श नहीं जाता है और अंखे अविरल बह उठती हैं  मानों अन्तर्मन को कोई झकझोर रहा है  मानों कोई ज्वाला सी जल रही है  और भाव बन कर आँखों से बह रही है  ऐसा ही हमेशा होता है और मैं मजबूर होकर  अपने आंसुओं को खामोशी से बहने देती हूँ  कोई ज़ोर जो नहीं है मेरा इन बहते हुए आंसुओं पर !! सीमा असीम   1,5,20