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फिर से कलियां मुस्कुरा कर खिली  है डालियाँ झुकी झुकी जा रही हैं सुनो प्रिय, आज मेरा दिल बार बार तुम्हें पुकार रहा है , ना जाने क्यों मन नहीं मान रहा है और जी रहा है एक बार तुमसे बात करूँ बस बात ही हो जाये तो मन बहल जायेगा और दिल जो तुम्हें पुकारे जा रहा है इसे थोड़ा सकूँ आ जायेगा ,,, मुझे लगता है यह तुम्हारे दिल की आवाज है जो मेरे दिल से निकल रही है ,, क्या तुम चाहते हो मुझसे कुछ कहना या सुनना , अगर हाँ तो करो न मुझसे कोई बात , बता दो वो सब बातें जो तुम्हें उदास करती हैं , तुम्हें निराश करती है और तुम्हारा दिल दुखा देती हैं तो कहो न मुझसे बोलो न कुछ , सब दुख खुशियों में बादल जाएँ ! करो मुझसे कोई बात कि आज दिल पुकारता है तुम्हें ... सीमा असीम  30,1,20 
रोते रोते थक चुकी थी आँखें अब मुसकुराना चाहती थी आँख बस छलक़ने ही वाली थी कि तुम सामने आ गए सनम ... दिल इतना तेज तो कभी नहीं धड़का था ,,आज ऐसा अहसास हुआ मानों कितने दिनों के बाद दिल में प्यार की उमंगें हिलोरे ले रही थी ,, मन मुस्कुरा उठा ,,जीने का मन करने लगा ,, सनम मैंने तो सोचा नहीं था कि मेरा प्रेम फिर से तुम्हारे मन में हरिया जायेगा और पहले से ज्यादा प्रेम उमड़ पड़ेगा और  मैं नाचने गाने को मजबूर हो जाऊँगी ,,सच है यही, तुम आ गए मेरे लिए प्रेम का सागर के लेकर मुझे उस में और भी ज्यादा गहरे तक डुबाने के लिए ,,,, तारो की भीड़ में जैसे एक अकेला चाँद होता है नवैसे ही हो तुम काली अंधेरी सर्द रात में जबकभीकोहरे को चीरतेहुएचाँद  आ जाता है न ,  मेरे प्रिय तो तुम हीलगते हो मुझे मेरे अपनेप्यारे चाँद और मैं उदास सर्द रात में भीजी खोल करमुस्कुरा उठतीहूँ कि तेरा होनाभर ही मेरेजीवन में ऊर्जा का संचार कर देता है ...सीमा असीम ,29,1,20 
तुम मेरे हो यह ख्याल भर नहीं  हो सिर्फ मेरे यही सच है  मेरे  नितांत अकेले पलों  में , मैं नहीं होती हूँ अकेली ,तुम होते हो मेरे साथ कभी उदासी बनकर आ जाते हो और कभी आँखों में आँसू बनकर बहने लगते हो , मैं याद करती हूँ तुम्हें अपने हर पल में कि तुम ही हो मेरे सब कुछ और कोई नहीं , कोई भी नहीं, कभी भी नहीं,जब  आधी रात को  एक दिन विदा लेता है  और दूसरा दिन शुरू हो जाता है,तब मैं  याद करती नहीं हूँ बल्कि तुम  याद आते  हो   जैसे कोई मंदिर का दीपक जल जाए चुपचाप ऐसे तुम आकर समा जाते हो मुझमें मैं  स्तब्ध हो तुम्हें निहारती रह जाती हूँ लेकिन तुम नजर नहीं आते तुम मेरे मन में बसे रहते हो ,, तुम मेरा कोई ख्याल भर नहीं हो तुम सच हो और मुझमें बसते हो अलग नहीं हो मुझसे , पल भर को भी अलग नहीं हो ,, कहते सुनते रहते हो अपने सुख दुख मुझसे और मेरे बहते हुए आंसुओं को अपने हाथों  से पोंछ देते हो प्रिय सुनो तुम जाओ कहीं भी हो मेरे ही सिर्फ मेरे ही और रहोगे मेरे जन्मों तक ,,,  क्योंकि मैं तुम्हें चाहती हूँ और तुम मुझे लेकिन मैं कु...
प्रेम भरे उस स्पर्श की स्मृति ,, जब जब  स्पर्श किया तुमने मुझे,, याद आता है मुझे ,,  तुम्हारा वो पहला स्पर्श मेरे रोम रोम को पुलकित कर रहा है कि वह पहला स्पर्श मेरे जीवन का सच में पहला स्पर्श था जिसे मेरे मन ने पहली बार महसूस किया ! क्या  तुम्हें पता था कि वो  स्पर्श अपूर्व था, अनुपम था , अमूल्य था !  उस स्पर्श की स्मृति से  ही मेरे सारे तन मन में अनोखी खुशी का संचार होने लगता है ,, गाने लगता है मन और तन नृत्य कर उठता है ..... क्या तुम्हें पता है कि तुम ही मेरा पहला प्यार हो जिसे मैंने अपने सच्चे मन से स्वीकार किया और जिया ! मुझे याद आते हैं फिर वे तुम्हारे स्पर्श जो हमेशा पहले  स्पर्श जैसा ही  सुख देते हैं लेकिन कभी मैं उदास होती  हूँ तब चाहती हूँ कि वही सुखद स्पर्श मुझे दे दो आकर और मैं अपनी नाराजगी भूल जाऊँ .....फिर मैं पुकारती हूँ तुम्हें कि आओ और आकर मेरे गले लग जाओ, मेरे तड़पते दिल को सकूँ दे जाओ .... रात के दूसरे प्रहार में जब मुझे नींद नहीं आ रही होती है तब मैं लिखती हूँ तुम्हें , अपनी  स्मृतियों में बसाये डूबती चली जाती हूँ ......
अय मेरे दिल मत घबरा मत हो उदास कि दुनिया की हर शय घबरा उठे ... हे मेरे ईश्वर                मैं नहीं समझ पाती कभी कि आखिर मेरी गलती क्या थी , या सजा किस लिए मिली , मैं सच हूँ न एकदम सच , क्या तुम नहीं जानते , तुम तो समझते हो मेरे मन की एक एक बात , मैं अपने तन मन और अपनी अंतरात्मा से पूरी तरह पवित्र हूँ फिर क्यों इतना दर्द , क्यों इतने दुख , क्यों इतने आँसू , क्यों इतनी तकलीफ , बताओ बोलो मेरे ईश्वर मुझे मेरे सवालों के जवाब दो , चाहिए मुझे जवाब , हाँ नहीं तो मैं मर जाऊँगी तब भी मुक्त नहीं हो पाऊँगी तड़पती रहूँगी ,आत्मा को भी कभी मुक्ति नहीं मिलेगी,,, ,कभी नहीं मिलेगी , यूं ही रोएगी जैसे आज रोती है ,, तड़पती है , मचलती और खुद को और भी ज्यादा तकलीफ देना चाहती है , और भी ज्यादा रोना चाहती है , खत्म लेना चाहती है ,, बस चाहती है तुम्हारी खुशी ,,, मेरे प्रिय ईश्वर  सुनो तुम खुश तो हो न ,, मैं चाहती हूँ तुम खुश रहो , मुसकुराते रहो , हाँ मैं ईश्वर नहीं हूँ लेकिन दुआ दे सकती हूँ मैं जानती हूँ कि मेरा सच्चा मन कभी किसी को कोई भी दुख नहीं देना चाहता ,,बिल...
अय मेरे दिल मुस्कुरा तू इतनी ज़ोर से कि सारी घबराहट दूर हो जाये ... हे मेरे ईश्वर,  जब दिल बुरी तरह घबरा जाता है ,घुटन से भर जाता है तो बस मन दो बातें ही चाहता है या तो खत्म हो जाये इस  दुनिया से झूठ या फिर  सच का कभी कोई दिल ना दुखाए ,,,कि दुखता है जब दिल तो आँसू बहते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी थमते नहीं हैं , बेजान सा जिस्म हर कार्य  को करने से इंकार कर देता है .....न जाने क्यों उलझता है मन और फिर लाख कोशिश करो सुलझता नहीं है क्योंकि मन से उठने वाले सवालों के जवाब खुद ही मन को देने होते हैं और वे सही हैं या गलत हम सिर्फ अहसास के सहारे ही निर्णय कर पाते हैं और हम नहीं चाहते कि मेरी बजह से किसी का जरा भी दिल दुखे या उसे कोई तकलीफ हो इसलिए हम अकेले ही सारे गम सारे दर्द सहते हैं , रोते हैं चीखते हैं चिल्लाते हैं और खुद को ही घायल कर लेते हैं ,,,,जख्मी होकर तड़पते हैं लहूलुहान कर लेते हैं और फिर उन जख्मों से टपकता है लहू , बहता है लाल सुर्ख खून ,,,, दीवानेपन की सारी हदें पार करके उसके चरम का स्पर्श का लेती हैं और हो जाती हैं दर्द की इंतिहां पार ,,,, फिर रो...
अति सर्वत्र वर्जयेत   हे मूर्ख इंसान इतनी अति मत फांक कि  धरती आसमान डोल जाये और खुल जाये भोले बाबा का तीसरा नेत्र , डर तू अपने कर्मों से, डर तू लोगो को सताने से, मूर्ख बना कर दुनिया को खुद को होशियार समझता है ...प्रकृति को नष्ट करके नोच खरोच और नुकसान करके खुद आगे बढ्न चाहता है ... बोल हे मूर्ख इंसान आखिर तू इस दुनिया से क्या चाहता है कितना लूटना चाहता है , कितना इकट्ठा करना चाहता है , आखिर तू क्यों है इतना कुटिल और छल वल से भरा हुआ, क्या तुझे समझ नहीं आता आज तू विनाश कर रहा है एक दिन तेरा विनाश हो जाएगा , टूट पड़ेगा तुझ पर ही प्रकृति का कहर , तब तू पछताएगा , दर्द से बिलबिला जायेगा , नहीं आएगा तुझ पर किसी का रहम ,न तू चैन की सांस ले पाएगा , घुट जायेगा तेरा भी दम , ओ मूर्ख मानव क्या तू अभी भी नहीं सुधरेगा , कितना और लूटेगा , कितना और बर्बाद करेगा ,  संभल जा अभी भी वक्त है कि अब प्रकृति घबरा उठी है और त्राहि त्राहि करने लगी है ,,,, 24,1,20