तुमने वहीं किया जो तुम्हें अच्छा लगा
कभी मेरे बारे में सोचा तक नहीं
अगर सोचते समझते कभी मेरी नज़र से
तो तुम कभी ऐसा करते ही नहीं
क्या मिलेगा तुम्हें इन गिरी हरकतों से
मैं सभाल रही तुम्हें तुम गिरते चले गये
अपनी नजरों तक में गिर गये
मेरी नजरें तो तुम्हें पहले ही गिरा चुकी
मान लेते मेरी बात या मुझे समझ लेते
तो प्रिय तुम कभी गिरते ही नहीं
जो गिरा एक बार वो बार बार गिरता है
आखिर तुम भी ऐसे ही निकले
अब क्या कहूँ तुम्हें
अब बचा ही क्या कहने को
अब तुम संभल भी जाओ तो
मेरी नज़र में कभी उठोगे नहीं...
सीमा
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