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असीम दुःख दर्द

 मुझे बस इतना पता है कि तुम किसी बात की परवाह नहीं करते हो, ना किसी से डरते हो, खुद गलत होते हुए भी खुद को हमेशा सही कहते हो, ना जाने क्यों किस लिए और आखिर किस वजह से, जो शहनशाही अपने लिए मन में पाल रखी है कि जो तुम हो वही सही है या जो कुछ भी तुम करते हो बस वही सही है या फिर जो कुछ भी तुमने किया बस वही सही है लेकिन तुम्हें एक बात बताऊं ऐसा नहीं होता है, खुद से भी बढ़कर एक शक्ति है जो सब कुछ देखती है, सब कुछ जानती है और सब कुछ समझती है, वह अभी सजा नहीं आपको दे रही है लेकिन समय आने पर उस सजा को तुम्हें भुगतना पड़ेगा, उस अंजाम को तुम्हें हर हाल में सहना पड़ेगा, जीना पड़ेगा तड़प तड़प कर, तुम्हें इस तरह से जैसे वह तुम्हें जीने की परमिशन देगा, इजाजत देगा सिर्फ वही तुम्हें करना होगा, तब तुम्हारी इच्छा से कुछ नहीं होगा या तुम्हारी मानने से, समझने से भी कुछ नहीं होगा, होगा वही जो कि वह सत्ता चाहती है, जो अलौकिक है अद्भुत है अचंभित कर देने वाली है और मेरा यकीन है कि वह सत्ता है और वह आज नहीं तो वक्त आने पर तुम्हें उसे अंजाम तक जरूर पहुंचाएगी जिस अंजाम के तुम हकदार हो या तुमने जो कुछ भी किया है...

प्रेम

 प्रेम के लिए लोगों ने  न जाने किया महल बनाये  दुमहल बनाये और दुनिया में अजूबे भी बनाकर खड़े कर दिए  लेकिन तुमने क्या किया  डुबा दिया मुझे इस कदर कि  उबरने का नाम ही नहीं है  बताओ कोई प्रेम को सर का ताज बना लेता है  और तुम जैसा कोई  प्रेम को गर्त में डुबा देता है  शायद तुम स्वार्थ के वश में  न जाने क्या क्या करते रहे  खुद को ही खुदा समझते रहे  कभी सोचा ही नहीं मेरे बारे में  दिया ही नहीं वो सम्मान  जिसकी मैं हकदार थी  अब क्या ही कहूँ और कितना कहूँ  कोई फर्क तो पड़ेगा नहीं न  तुम क्या जानोगे प्रेम की  ऊंचाइयों क्या होती हैं  कैसे प्रेम को निभा लिया जाता है  हर गलती को माफ़ कर गले से लगा लिया जाता है  काश कि आये तुम्हें सद्बुद्धि  थोड़ी ही सही  आये और मुझे समझ पाओ  साथ ही प्रेम को भी.... सीमा असीम  2,3,25

प्रेम और घृणा

 घृणा और प्रेम का एक ऐसा नाता है  जिसे एक दूसरे से कभी अलग किया ही नहीं जा सकता  जहां प्रेम है वहाँ घृणा है और  जहाँ घृणा है वहां प्रेम है  प्रेम के अंदर घृणा घुसी हुई है और घृणा के अंदर प्रेम हम जिसे प्रेम करते हैं  उसी से हम घृणा भी करते हैं और  जिसे घृणा करते हैं  उसी से हम प्रेम करते हैं  अधाह प्रेम करते हैं और  अधाह घृणा भी  न जाने क्यों ऐसा है? लेकिन यही सच है  तभी तो मैं तुम्हें जितना प्रेम करती हूं  उतनी ही तुमसे घृणा करती हूं और  जितनी मैं तुमसे घृणा करती हूं  उससे कई कई गुना ज्यादा मैं  तुमसे प्रेम करती हूं  यही सच है और  यह सच कभी खत्म नहीं हो सकता  हमेशा रहेगा  प्रेम और घृणा का संबंध यूं ही... सीमा असीम  1,3,25

तुम

 तुम जब आँखों को बंद करते होंगे  नज़र तो सिर्फमैं ही आती होऊंगी  खोलकर आँखों को भी नज़र से  तुम्हारी दूर कहाँ होती होऊंगी  करते होंगे तुम चाहें जितना जतन  पलभर को भी न निजात मिलती होंगी  कहो तो मैं तुम्हें न याद करूँ  पर यह बात न मुझसे होंगी  कि भूलने को तुम्हें मैं याद न करूँ  अब तो यह आदत है मेरी और तुम्हारी भी  कि न तुम मुझे दूर कर पाते हो  न ही मैं भुला पाती हूँ  अजीब सी कोई दास्तां बन रही है  कि गुल कोई कमाल का खिलेगा  यादों को बना कर ताबीज सा  जो पहना दिया है तुमने  उसमें अब तुम ही बंध गये हो  चाह कर भी नहीं मिलेगी मुक्ति  और भी ज्यादा जकड़ गये हो  बस यही तो है सच और सच्चाई भी न..... सीमा असीम  28,2,24

याद

 न जाने कितनी राते हैं मेरी  तुम्हें याद करते हुए गुजर जाती है  जानती हूं कि तुम मेरे हो और सिर्फ मेरे ही हो  क्योंकि मन जिसके पास है बस वही तो उसका अपना है  मेरा मन हमेशा तुम्हारे पास है और  तुम्हारा मेरे पास  ऐसा हो ही नहीं सकता कि  मेरा मन तुम्हारे पास लगा रहे और  तुम्हारा मेरी तरफ ध्यान ही ना जाए  कितना घबराहट होती है  दिन भर में कितनी ही बार  जाकर तुम्हें देख लेती हूं और  फिर मन को समझ लेती हूं  कभी दो बूंद आंखों से छलका लेती हूं और  अपनी आंखों की जलन को मिटा लेती हूं  अक्सर ऐसा होता है कि पल भर को  भूलने की कोशिश करती हूं पर  मेरी कोशिश हमेशा नाकाम हो जाती है और  तुम्हारी याद मेरे मनमस्तिष्क पर कब्जा जमा लेती है और   तुम्हें, मेरा और मुझे तुम्हारा बनाए रखती है  यूँ ही सदा  या जन्मों जन्मान्तरों के लिए... सीमा असीम  27,2,25

तुम ही तो

 सुनो कि मैं तुम्हें याद करती हूँ  कि अटक से गए हो मेरे हृदय में  एक आवाज एक पुकार आती है और  अंतर मन से टकराकर मस्तिष्क में गूंजती हुई फिर  वापस हृदय में समा जाती है  मैं तुम्हें देखती हूं ख्वाबों में   अपने अदृश्य मन से  ख्वाबों भरी आंखों से  हर वक्त अपने आस-पास मैं महसूस करती हूं तुम्हें  बिल्कुल अपने करीब और  मैं तुम्हें सुनती हूं तुम्हारी आवाज को  जो गूंजती है ब्रह्मांड में  सिर्फ तुम्हें ही तो  तुम्हारे सिवा और किसी को  कहाँ याद करती हूं और  मैं किसका नाम लेती हूं और  मैं किसे पुकारती हूँ  सिर्फ तुम ही तो हो  जो बसे हो  मेरे हृदय में  मेरे अंतर मन में  और  मेरी आत्मा में  तुम ही  सिर्फ तुम ही  सीमा असीम 

प्रेम

 शायद हम प्रेम भी आजकल  व्यापार की तरह करने लगे हैं  वीकेंड मनाते हैं  डेट पर जाते हैं  वैलेंटाइन डे मनाते हैं  वेलेंटाइन वीक भी मनाते हैं  टेडी डे  चॉकलेट डे कितनी ही तरह के डे हम मनाते हैं लेकिन  क्या हम सच में दिल से प्रेम निभा पाते हैं  क्या प्रेम सिर्फ चॉकलेट देने से  टैडी देने से हो जाता है  या गले लगाने से  चुम लेने से प्रेम होता है  या फिर हम किसी से वादा कर देते हैं  तो क्या उससे भी प्रेम हो जाता है  शायद हम प्रेम को समझ ही नहीं पाते  शायद हमने प्रेम को कभी समझ ही नहीं  तभी तो हम देने लेने में इतना खो जाते हैं कि प्रेम की गरिमा को भूल जाते हैं  प्रेम क्या है  कैसे हैं  क्यों होता है  नहीं जानते हैं  अगर हम जानते तो हम गहराई में उतर जाते और  उसे अपने अंतर मन से निभाते  जन्म जन्म तक  क्योंकि प्रेम एक जन्म के लिए नहीं होता  प्रेम तो एक ऐसी भावना है अगर  आपके मन में घर कर जाए तो  वह कभी खत्म ही नहीं होती और  अगर खत्म हो जाए तो  श...