तुम ही तो
सुनो कि मैं तुम्हें याद करती हूँ
कि अटक से गए हो मेरे हृदय में
एक आवाज एक पुकार आती है और
अंतर मन से टकराकर मस्तिष्क में गूंजती हुई फिर
वापस हृदय में समा जाती है
मैं तुम्हें देखती हूं ख्वाबों में
अपने अदृश्य मन से
ख्वाबों भरी आंखों से
हर वक्त अपने आस-पास
मैं महसूस करती हूं तुम्हें
बिल्कुल अपने करीब और
मैं तुम्हें सुनती हूं तुम्हारी आवाज को
जो गूंजती है ब्रह्मांड में
सिर्फ तुम्हें ही तो
तुम्हारे सिवा और किसी को
कहाँ याद करती हूं और
मैं किसका नाम लेती हूं और
मैं किसे पुकारती हूँ
सिर्फ तुम ही तो हो
जो बसे हो
मेरे हृदय में
मेरे अंतर मन में और
मेरी आत्मा में
तुम ही
सिर्फ तुम ही
सीमा असीम
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