तुम

 तुम जब आँखों को बंद करते होंगे 

नज़र तो सिर्फमैं ही आती होऊंगी 

खोलकर आँखों को भी नज़र से 

तुम्हारी दूर कहाँ होती होऊंगी 

करते होंगे तुम चाहें जितना जतन 

पलभर को भी न निजात मिलती होंगी 

कहो तो मैं तुम्हें न याद करूँ 

पर यह बात न मुझसे होंगी 

कि भूलने को तुम्हें मैं याद न करूँ 

अब तो यह आदत है मेरी और तुम्हारी भी 

कि न तुम मुझे दूर कर पाते हो 

न ही मैं भुला पाती हूँ 

अजीब सी कोई दास्तां बन रही है 

कि गुल कोई कमाल का खिलेगा 

यादों को बना कर ताबीज सा 

जो पहना दिया है तुमने 

उसमें अब तुम ही बंध गये हो 

चाह कर भी नहीं मिलेगी मुक्ति 

और भी ज्यादा जकड़ गये हो 

बस यही तो है सच और सच्चाई भी न.....

सीमा असीम 

28,2,24

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