प्रेम और घृणा
घृणा और प्रेम का एक ऐसा नाता है
जिसे एक दूसरे से कभी अलग किया ही नहीं जा सकता
जहां प्रेम है वहाँ घृणा है और
जहाँ घृणा है वहां प्रेम है
प्रेम के अंदर घृणा घुसी हुई है और
घृणा के अंदर प्रेम
हम जिसे प्रेम करते हैं
उसी से हम घृणा भी करते हैं और
जिसे घृणा करते हैं
उसी से हम प्रेम करते हैं
अधाह प्रेम करते हैं और
अधाह घृणा भी
न जाने क्यों ऐसा है?
लेकिन यही सच है
तभी तो मैं तुम्हें जितना प्रेम करती हूं
उतनी ही तुमसे घृणा करती हूं और
जितनी मैं तुमसे घृणा करती हूं
उससे कई कई गुना ज्यादा मैं
तुमसे प्रेम करती हूं
यही सच है और
यह सच कभी खत्म नहीं हो सकता
हमेशा रहेगा
प्रेम और घृणा का संबंध यूं ही...
सीमा असीम
1,3,25
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