असीम दुःख दर्द

 मुझे बस इतना पता है कि तुम किसी बात की परवाह नहीं करते हो, ना किसी से डरते हो, खुद गलत होते हुए भी खुद को हमेशा सही कहते हो, ना जाने क्यों किस लिए और आखिर किस वजह से, जो शहनशाही अपने लिए मन में पाल रखी है कि जो तुम हो वही सही है या जो कुछ भी तुम करते हो बस वही सही है या फिर जो कुछ भी तुमने किया बस वही सही है लेकिन तुम्हें एक बात बताऊं ऐसा नहीं होता है, खुद से भी बढ़कर एक शक्ति है जो सब कुछ देखती है, सब कुछ जानती है और सब कुछ समझती है, वह अभी सजा नहीं आपको दे रही है लेकिन समय आने पर उस सजा को तुम्हें भुगतना पड़ेगा, उस अंजाम को तुम्हें हर हाल में सहना पड़ेगा, जीना पड़ेगा तड़प तड़प कर, तुम्हें इस तरह से जैसे वह तुम्हें जीने की परमिशन देगा, इजाजत देगा सिर्फ वही तुम्हें करना होगा, तब तुम्हारी इच्छा से कुछ नहीं होगा या तुम्हारी मानने से, समझने से भी कुछ नहीं होगा, होगा वही जो कि वह सत्ता चाहती है, जो अलौकिक है अद्भुत है अचंभित कर देने वाली है और मेरा यकीन है कि वह सत्ता है और वह आज नहीं तो वक्त आने पर तुम्हें उसे अंजाम तक जरूर पहुंचाएगी जिस अंजाम के तुम हकदार हो या तुमने जो कुछ भी किया है जिस तरह से भी किया है और उसका तुम्हें पछतावा भी नहीं है अगर तुमने पछतावा कर लिया होता तो शायद थोड़ा तुम्हारे ऊपर एहसान होता थोड़ा, तुम्हारे ऊपर रियायत होती थोड़ा, तुम्हें एक मौका मिलता माफ़ी का लेकिन वह तुमने नहीं किया, पछतावा तो बहुत दूर की बात है तुम्हें इस बात का एहसासे तक नहीं कि तुमने कितना गलत किया है और उसे गलती की सजा तुम्हें मिलेगी जरूर, किसी को तुमने तिल तिल रुलाया है, ऐसे रुलाया है कि चीत्कार से आसमान फट गया होगा, उसकी चीख से उसके दर्द से फट गई होगी धरती भी, दहल गया होगा ब्रह्माण्ड भी लेकिन तुम्हें फर्क नहीं पड़ा, उसकी चीखों की आवाज तुम्हें सुनाई नहीं दी, तुम्हें उसके दर्द महसूस नहीं हुए, तुम्हें आंसुओं की कोई फर्क नहीं पड़ा धिक्कार है तुम्हें, लानत है तुम्हें, मैं कहती हूं कि तुम्हें एक इंसान होने का भी हक नहीं है क्योंकि तुम्हारे अंदर कोई इंसानियत नाम की चीज नहीं है न भावनाये हैं तुम सिर्फ मांस का लोधाड़ा हो जो इस दुनिया में लुढ़कता फिर राहा है मुझ जैसों को जीते जी मार देने के लिए ......

सीमा असीम 

5,2,25

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