प्रेम

 प्रेम के लिए लोगों ने 

न जाने किया महल बनाये 

दुमहल बनाये और

दुनिया में अजूबे भी बनाकर खड़े कर दिए 

लेकिन तुमने क्या किया 

डुबा दिया मुझे इस कदर कि 

उबरने का नाम ही नहीं है 

बताओ कोई प्रेम को सर का ताज बना लेता है 

और तुम जैसा कोई 

प्रेम को गर्त में डुबा देता है 

शायद तुम स्वार्थ के वश में 

न जाने क्या क्या करते रहे 

खुद को ही खुदा समझते रहे 

कभी सोचा ही नहीं मेरे बारे में 

दिया ही नहीं वो सम्मान 

जिसकी मैं हकदार थी 

अब क्या ही कहूँ और कितना कहूँ 

कोई फर्क तो पड़ेगा नहीं न 

तुम क्या जानोगे प्रेम की 

ऊंचाइयों क्या होती हैं 

कैसे प्रेम को निभा लिया जाता है 

हर गलती को माफ़ कर गले से लगा लिया जाता है 

काश कि आये तुम्हें सद्बुद्धि 

थोड़ी ही सही 

आये और मुझे समझ पाओ 

साथ ही प्रेम को भी....

सीमा असीम 

2,3,25

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