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वक्त

तू खुश है कि तेरी मनमानियाँ तेरी मन्मर्जियाँ जारी हैं तू खुश है कि जो चाहें किया जैसे चाहें जिया तू खुश है कि तेरे लिए सब खेल है पल भर का मेल है तू खुश है कि तुझे कोई दर्द नहीं कोई मन में गिला नहीं तू खुश है कि जिसे मन किया आने दिया जिसे मन चाहें दगा दिया खुश होगा इश्वर भी एक दिन यूँ ही कभी जब खोलेगा तेरे काले चिट्ठे जब करेगा खड़ा कटघरे में कि वक्त को आने में वक्त लगता जरुर है पर सही वक्त आता भी जरुर है !!! सीमा असीम

ख़ामोशी

खामोश हो गयी हूँ मैं बहुत ज्यादा इतनी ज्यादा कि दिल अब कुछ कहना नहीं चाहता है office.nbt@nic.in न कुछ सुनना चाहता है न खुद से न किसी और से बस आंख भर आती है और आत्मा चीत्कार कर उठती है आत्मा से निकली हुई यह चीत्कार सात आसमान चीर देती है ] तुम क्या चीज हो सिर्फ अदने से एक इन्सान ही तो जो आत्मा विहीन एक जिस्म भर है जिसे चाहिए होती हैं जिस्मानी खुशियाँ मात्र जिस्म की भूख मिटने तक की चाहत होती है तुम्हारी एक दुसरे जिस्म से वो भला आत्मिक प्रेम को कहाँ समझेगा कहाँ होगी उसकी नजरों में कोई अहमियत किसी के सच्चे प्रेम की बस इसलिए ही खामोश रहने को जी चाहता है न तुमसे कुछ कहना है अब न किसी और से मौन को धारण कर लिया और मुस्कान को सजा लिया है चेहरे पर अपने लबों पर ...... सीमा असीम

आँखों में

जब कभी याद करते हुए तुमको खो जाती हूँ मैं ख्वाबों में तो लगता है हूँ वहीँ पर जहाँ गुजरे थे मैंने संग संग दिन और रात हर वक्त साथ साथ कभी मेरा हाथ पकड कर मुझे सहारा दे देना और कभी मेरे सामान को खुद ही उठा लेना कितना ख्याल कितनी परवाह कितनी चाहत छलक उठती थी तुम्हारी आँखों में मानों दुनिया की सारी खुशियाँ मेरे क़दमों में डाल देना चाहते थे और खुद बिखर जाना चाहते थे मेरी राहों में कि छू न सके कोई तकलीफ मुझे कहीं मैं घबरा न जाऊं किसी भी तरह से सब नजर आता था तुम्हारी आँखों में सीमा असीम

तुम हो संग सदा

हर रूप में तुम्हें पा लेती हूँ मैं और तुम मुझे हर किसी में देख लेते होगे तभी तो मैं जानती हूँ कि तुम हो हर कहीं हर समय में मुझे अच्छा लगता है कि तुम्हें पल भर कोभी न बुला पाती हूँ तुम भी मुझे कभी भूल नहीं पाते हो आज जब मैं इस वक्त कुछ लिख रही हूँ तो मुझे लगता है तुम हो मेरे पास मेरे साथ मेरी उँगलियों के माध्यम से की बोर्ड को चलते हुए मेरे पास बैठे मुस्कुराते हुए यह मेरा वहम नहीं है यह सच है और हाँ बस यही एक सच है !!! सीमा असीम

नमी

यह जो मेरी आँखों में नमी भर आती है वो कोई पानी नहीं बल्कि तुम हो जो बार बार तुम पिघलते हो और यहाँ मेरी आँखों से छलकते हो सुनो क्यों तुम मुझे इतना याद करते हो मैं हूँ न तुम्हारे साथ साथ हरदम आसपास किसी परछाईं की तरह या कलाई में चलती हुई नब्ज की तरह पल भर को दूर नहीं हूँ तुम जानते तो हो न मुझे अब समझ भी गए होगे सच हूँ मैं एकदम सच हाँ मैं तुम्हारा सच हूँ और रहूंगी हमेशा जन्मों तक जैसे हो तुम मेरे ही जन्मों जन्मों तक .... सीमा असीम  कैसी बातें कर रही हो ईशा को ही मां-बाप अपने बच्चों का बुरा थोड़ी ना सोते हैं वह तो भला ही सोचेंगे हर हाल में वह तो उन्होंने जब अपने बच्चों को पैदा किया पहले पोशाक सहायक बनाया तो उनका तो हक बनता है ना कि अपने बच्चों के अच्छे बुरे को समझें और वैसा ही करें और शादी करने के लिए 25 साल कोई कम उम्र तो होती नहीं है तुमने वह कहावत थी इसलिए की 25 साल तक ब्रह्मचर्य उसके बाद ग्रस्त फिर 50 साल के बाद बनप्रस्थ और 75 साल के बाद सन्यास ले लेना चाहिए   अच्छा ऐसी बात है फिर तुमने 25 साल की उम्र तक ब्रह्मचर्य क्यों नहीं पालन किया इसने मुस्कुरा कर रतन...

रंग

रंग______ थोड़े से रंग मुट्ठी भर रंग नहीं रंग सकते पूरी दुनिया को पर रंग सकते हैं एक मन को एक तन को कि जरूरी है ना एक मुट्ठी रंग ताकि रंग सके हम अपना मन देखा है कभी किसी रंगे हुए मन को नजर आती है उसे रंगी हुई सारी दुनिया सारा जहां यूं ही तो रंगा था राधा ने भी अपने मन को मुट्ठी भर रंग प्रेम का रंग रंग लिया खुद को और हो गई प्रेम मय उस रंग को बिखेर दिया पूरी दुनिया में पूरे जहाँ में रंग प्रेम का और हो गया उनका जीवन सार्थक ।।।। सीमा असीम