नमी
यह जो मेरी आँखों में नमी भर आती है
वो कोई पानी नहीं बल्कि तुम हो
जो बार बार तुम पिघलते हो और
यहाँ मेरी आँखों से छलकते हो
सुनो क्यों तुम मुझे इतना याद करते हो
मैं हूँ न तुम्हारे साथ साथ
हरदम आसपास
किसी परछाईं की तरह या
कलाई में चलती हुई नब्ज की तरह
पल भर को दूर नहीं हूँ
तुम जानते तो हो न मुझे
अब समझ भी गए होगे
सच हूँ मैं एकदम सच
हाँ मैं तुम्हारा सच हूँ
और रहूंगी हमेशा जन्मों तक
जैसे हो तुम मेरे ही
जन्मों जन्मों तक ....
सीमा असीम
कैसी बातें कर रही हो ईशा को ही मां-बाप अपने बच्चों का बुरा थोड़ी ना सोते हैं वह तो भला ही सोचेंगे हर हाल में वह तो उन्होंने जब अपने बच्चों को पैदा किया पहले पोशाक सहायक बनाया तो उनका तो हक बनता है ना कि अपने बच्चों के अच्छे बुरे को समझें और वैसा ही करें और शादी करने के लिए 25 साल कोई कम उम्र तो होती नहीं है तुमने वह कहावत थी इसलिए की 25 साल तक ब्रह्मचर्य उसके बाद ग्रस्त फिर 50 साल के बाद बनप्रस्थ और 75 साल के बाद सन्यास ले लेना चाहिए
अच्छा ऐसी बात है फिर तुमने 25 साल की उम्र तक ब्रह्मचर्य क्यों नहीं पालन किया इसने मुस्कुरा कर रतन की तरह देखा कुछ हमारी तरह जिद्दी इंसान होते हैं जो हर बात में जो जेठ लेते हैं वही करते हैं और अपने मां-बाप को भी उचित के आगे झुका लेते हैं जो वह चाहते हैं उसे पाने के लिए कुछ भी कर लेते हैं लेकिन हर कोई थोड़े ना ऐसा होता है खासतौर से लड़कियां भी तो मां-बाप की लाडली तो होती ही है और वह सबसे ज्यादा अपने मां-बाप की कदर करती है उनका ख्याल करती है उनके सुख दुख का और उनकी भावनाओं का सबसे ज्यादा ध्यान तो लड़कियां ही रखती है ना ऐसा
तो क्या रतन में अपने मां-बाप की अपेक्षाओं पर खड़ा होता पाओगे मैं उनकी भावनाओं को ठेस तो नहीं पहुंचा दूंगी जब मैं और लड़कियों को देखती हूं कि वह अपने मां-बाप का कितना ख्याल रखते हैं वह जो कहते हैं वही मान लेती है उनके हिसाब से ही अपने जीवन की दर को आगे बढ़ते हैं और मैं मुझे कभी-कभी बहुत दुख होता है मैं अच्छी लड़की नहीं हूं ररतन
अरे इरशाद क्या अरे इरशाद तुम क्या बातें लेकर बैठ गई यह तो दुनिया है यहां सब तरह के लोग होते हैं और तुम तो इतनी अच्छी लड़की हो अपने मां-बाप की कितना कितना ख्याल रखती हो हम सब लोगों का इतनी दूर रहकर भी तुम्हें हर वक्त उनकी फिक्र रहती है ना क्योंकि तुम मेरे साथ रहती हो फिर भी तुम्हारा मन तो अपने परिवार में ही रहता है ना तुम गलत हो ही नहीं सकती गलत तो मैं था जो मैंने तुम्हें इस तरफ धकेल दिया यह कहे मैं अपनी खुशी के लिए तुम्हें अपना बना लिया इसलिए आज के बाद कभी भी अपने आप को गलत मत कहना जो भी किया मैंने किया और मैं ऐसी ना ठोक कर कहता हूं कि मैं अच्छा ही किया कुछ गलत नहीं किया अपनी जिंदगी में किसी को अपना बनाना है किसी को प्रेम करना कुछ गलत नहीं है तुम्हें ही प्रेम करता हूं आज भी कल भी और हमेशा इस बात को तुम देख लेना रतन ने दावे के साथ कहा
ऐसा कुछ नहीं बोली बस मुस्कुरा दे उसकी आंखों में होने की अभी आंसू की नमी भर आई थी वह सोचने लगी थी कि रतन गलत कैसे हो सकता है केवल गलती तो दोनों से ही हुई है और ताली कभी यह कहां से कहां बस्ती है दोनों हाथों से ही ताली बजती है बस किसी तरह से उसके मां-बाप उसकी मां और उसकी शादी रतन के साथ खूब धूमधाम से हो जाए लेकिन मन में सिर्फ एक ही कर सके कि रतन इतने ऊंचे खानदान का और मैं एक दलित की बेटी कैसे मिलेगी कैसे चलेगी हालांकि उसके पापा बाबा सब अच्छे बिजनेस नौकरी में ही रहे हैं उन्होंने कभी कोई ऐसा काम ही नहीं किया जिससे कि समाज में उनकी इज्जत करती हो बस एक जाट का वर्क है
क्यों बना दे इंसान ने कितने इजाजत बाद भेदभाव उच्च नीच इसने तो सबको एक सही इंसान बनाया है सबकी वही तो आंखें हैं धोखा एकनाथ दोपहर फिर क्या परेशानी है हो गया इस तरह से करने में रंग रूप से किसी को रख लो तो तू भी कहलाता है यहां तो जाट-पाठ में बांट दिया वह ऊंचा है वह नीचे है यह गलत काम ईशा क्या सोचने लग गई ऐसा कोई इंसान खड़ा देखकर रतन नहीं पूछा तुम अपने मन में कोई भी टेंशन मत रखो मैं हूं ना हर कदम पर तुम्हारे साथ और तुम्हारे जैसी लड़की इस दुनिया में कोई भी नहीं है मेरे लिए मैं तुम्हें जो कहोगे वह करने को तैयार हूं तुम बस खुश रहो और हां उठो जाओ जल्दी से तैयार हो जाओ जल्दी से जाओ वरना लेट हो जाएगी ना हां रतन बस जा रही हूं अभी तैयार होने के लिए इशा तैयार होने के लिए चली गई जब वह बाहर आए तो रतन ने देखा वह वाइट कलर का कॉटन का चिकनकारी वाला टॉप ब्लू जींस और कानों में बड़े-बड़े गोल आकार के इयरिंग पहनी हुई थी बहुत खूबसूरत लग रही थी ईशा मेकअप भी नहीं किया था फिर भी अलग से मासूमियत उसके चेहरे पर झलक रही थी ईशा खूबसूरत तो है ही बहुत और बोली भी है उसके मन में कोई चना की छल कपट नहीं है जिस वजह से उसके चेहरे पर अलग ही निकला रहता है रतन उसे देखा ही रह गया ओ हेलो रतन मैं जा रही हूं बाय क्या देख रहे हो ऐसे कब तक देखते रहोगे सुन क्यों नहीं रहा है अरे हां सुन रहा हूं बस देख रहा था कि मेरी ईशा को किसी की नजर ना लगे अच्छा ठीक है नहीं लगेंगे ऐसा आज मैं बहुत खुश हूं मेरे मैं अपनी मां को अपने साथ में अगर बहुत खुश हूं बस मेरे दादाजी और पिताजी दोनों लोग मान जाएंगे क्योंकि बड़े के लोगों के आशीर्वाद से जो काम होते हैं उसका अलग ही फल मिलता है अलग ही जीवन में सुख होता है खुशी होती है लेकिन ईशा अगर हमें मां-बाप का आशीर्वाद नहीं मिलेगा तो फिर क्या फायदा ऐसे जीवन को शुरू करने से अरे रतन अभी तो तुम इतनी अच्छी बातें कर रहे थे अभी निराशा वाली बातें क्यों करने लगे आई मुझे तो हौसला बढ़ा रहे थे आपको खुद उदास हो गए ऐसा कुछ नहीं होगा देखना तुम्हारी मम्मी सभी लोगों को मना लेंगे वह कभी कुछ नहीं कहेंगे मां पिताजी मम्मी से आगे तो नहीं है और तुम्हारे साथ तुम आए और इसके साथ मां होती है उसके साथ कायनात होती है इस मम्मी को बसते हैं मन से बड़ा इस दुनिया में कौन है बताओ ईश्वर के बाद माही तो है इस धरती पर जो हमें आशीर्वाद देती है तो ऐसा लगता है कि हां ईश्वर ने हमें वरदान दे दिया या हमारे जियो खुशी के लिए अपना कुछ निछावर कर दिया हां सही बात तो है लेकिन कभी-कभी मन में ऐसा ख्याल आता है रतन ने कहा तो ऐसा उसके गले से लग गई ना जाने कितनी सदियों से मैं दोनों एक थे और कितना प्यार है उन दोनों के मन में एक दूसरे के लिए कितना प्रेम है कितनी तड़प है कि एक पल को भी एक दूसरे से अलग रहना मुश्किल है आज इतने दिनों के बाद तो रतन आया है और वह जा रही है इस वजह से वह दुखी नहीं है बल्कि ना जाने क्यों एकदम से वह बाबू खोकर रतन के गले से लग गई रतन ने भी उसे अपनी बाहों में समेट लिया और माथे को चुनते हुए कहा इशा मैं तेरे साथ हूं हमेशा इसने कहा हां रतन मैं भी तुम्हारे साथ हूं हमेशा, आहार निकाली और आंखों से अशुद्धारा बहन निकली न जाने क्यों यह खुशी के आंसू थे मिलन के बचों के तड़प के आंखों के बचों के या फिर प्रेम के कुछ नहीं कहा जा सकता बस बोल नहीं रहे थे और कुछ कह नहीं रहे थे एक दूसरे के गले से लगे आंखों से आंसू बहा रहे थे प्रेम का तो कोई ना शब्दों से नाता है ना किसी बातों से नाता है हृदय के उड़कर होते हैं तो दूसरा हृदय सुन पता है की बातें सुनाने लगे तो वही सा सच्चा प्रेम है कभी न मिटने वाला कभी ना खत्म होने वाला हमेशा रहने वाला रतन और ईशा सच्ची प्रेम में बन गए थे उनकी रूह आपस में जो कही थी मैं दूर होकर भी दूर नहीं थे उन्हें कोई दूर कर ही नहीं सकता था ना उनके मां-बाप ना कोई और लेकिन ईश्वर को क्या मंजूर है कुछ नहीं कहा जा सकता ईश्वर की मर्जी के आगे सब कुछ फेल है हम इंसानों की क्या विचार ईश्वर के आगे जो वही चाहता है वही तो होता है भोपाल में क्या से क्या कर देता है राजा को रंग बना देता है और रंग को राजा भिखारी को अमीर और अमीर को गरीब इसको मिला देता है या तो कर देता है सब उसकी मर्जी किसी कहां मिलेगा कहां किस अलग करेगा किस मिलन देगा किसी के भी रहे किधर है कुछ नहीं कह सकते सर्वेश्वर की मर्जी है सब विधि का विधान है जो लिखा है वह होता ही है वह होकर ही रहता है
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