ख़ामोशी

खामोश हो गयी हूँ मैं बहुत ज्यादा इतनी ज्यादा कि दिल अब कुछ कहना नहीं चाहता है office.nbt@nic.in न कुछ सुनना चाहता है न खुद से न किसी और से बस आंख भर आती है और आत्मा चीत्कार कर उठती है आत्मा से निकली हुई यह चीत्कार सात आसमान चीर देती है ] तुम क्या चीज हो सिर्फ अदने से एक इन्सान ही तो जो आत्मा विहीन एक जिस्म भर है जिसे चाहिए होती हैं जिस्मानी खुशियाँ मात्र जिस्म की भूख मिटने तक की चाहत होती है तुम्हारी एक दुसरे जिस्म से वो भला आत्मिक प्रेम को कहाँ समझेगा कहाँ होगी उसकी नजरों में कोई अहमियत किसी के सच्चे प्रेम की बस इसलिए ही खामोश रहने को जी चाहता है न तुमसे कुछ कहना है अब न किसी और से मौन को धारण कर लिया और मुस्कान को सजा लिया है चेहरे पर अपने लबों पर ...... सीमा असीम

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