चुनर...
कितने दिन बीत गए देखा ही नहीं मैंने कोई तो होगा जो बुला कर ले आएगा उन्हें और मिला देगा मुझसे अब थक गई हूं मैं अब हार गई हूं मैं इंतजार कर कर के ईश्वर से दुआ कर करके अब तो आओ आ जाओ मैं अपनी चुन्नी को रोज अपने आंसुओं से भिगोती हूं फिर उसे कूट-कूट कर पटक पटक कर धोती हूं कि सारा गुस्सा उस पर उतार देती हूँ कि चुनरी के सारे रंग फीके पड़ गए हैं कि अब आओ और नई चुनरी दिला जाओ रंग बिरंगी सतरंगी कढ़ाई कसीदे वाली सबसे सुंदर सबसे प्यारी उससे सुंदर चुनरी कोई ना हो उस जैसा रंग किसी के पास ना हो आओ अब तो आओ और अब चले आओ सजन ... .... सीमा असीम 30, 8, 20