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चुनर...

  कितने दिन बीत गए देखा ही नहीं मैंने  कोई तो होगा जो बुला कर ले आएगा उन्हें  और मिला देगा मुझसे   अब थक गई हूं मैं  अब हार गई हूं मैं  इंतजार कर कर के  ईश्वर से दुआ कर करके   अब तो आओ  आ जाओ  मैं अपनी चुन्नी को  रोज अपने आंसुओं से भिगोती हूं फिर उसे कूट-कूट कर   पटक पटक कर धोती हूं  कि सारा गुस्सा उस पर उतार देती हूँ  कि चुनरी के सारे रंग फीके पड़ गए हैं  कि अब आओ और नई चुनरी दिला जाओ   रंग बिरंगी  सतरंगी  कढ़ाई कसीदे वाली  सबसे सुंदर  सबसे प्यारी  उससे सुंदर चुनरी कोई ना हो   उस जैसा रंग किसी के पास ना हो  आओ  अब तो आओ और अब चले आओ सजन ... .... सीमा असीम  30, 8, 20
 जो चोट तुमने और तुम्हारी आदत  ने मिलकर मेरे मन को पहुंचाई है उसकी भरपाई कौन करेगा?  मेरे अंतस को मेरी आत्मा को घायल और जख्मी किया है उस का न्याय कब होगा?  नीचा दिखाना,  अपमानित करना और हर हाल में बुरा चाहना, उसको कौन देखेगा, कौन समझेगा?  सिर्फ अपना सोचना अपने बारे में बात करना अपने लिए ही कुछ करना ऐसे कैसे चलेगा ऐसे कैसे चलेगा ऐसे कैसे मिलेगा एक तरफा एक तरफा एक तरफा...... 
 कितना स्वार्थी होता है इंसान अपने स्वार्थ के लिए कितना नीचे गिरता है वह भी नहीं देखता कि सामने वाले को ऐसे कितनी तकलीफ हो रही होती है लेकिन जो स्वार्थी इंसान है उसे क्या फर्क पड़ता है वह तू अपने स्वार्थ के लिए ही सब कुछ करता है गिरता है चाहे कुछ भी करता है वह अपने स्वार्थ पूर्ति कर ही देता है स्वार्थी इंसान का कोई जमीर नहीं होता उसके मन में कोई इंसानियत नहीं होती प्रेम की कोई भावना होती है ना किसी के दर्द या दुख से उसे कोई मतलब होता है तू जीता है सिर्फ अपने लिए और अपने लिए ही मर जाता है अपने सुख के लिए वह नए नए रास्ते तलाश था है और उन्हीं रास्तों पर चलता है जिससे सुख मिलता है वह उधर ही जाता है और जिन रास्तों पर वह चलता आया है उन रास्तों पर देखता भी नहीं है क्योंकि वह स्वार्थ पूर्ति कर चुका होता है और उस रास्ते पर जाकर उसे कुछ इतना खास मिलने वाला नहीं होता है स्वार्थी इंसान कभी अपना नहीं हो सकता उसे चाहे आप अपना बनाने के दाग कोशिश करो वह कभी नहीं होगा तुम्हारा कभी नहीं होगा  एक सच्चा इंसान वह सिर्फ तुम्हारा ही रहता है सिर्फ तुम्हारा वह दूसरी तरफ कभी नजर में नहीं डालता उसका ध्य...

दर्द

 दिल भर भर के आता है  आंखों से आंसू बहाता है न जाने क्यों तू मझे इस कदर  बेतरह तड़पाता है.   इस तरह खींचते हैं प्राण  मानो जान निकल जाएगी  आत्मा भी इस तरह तड़पती है  नस नस भी दर्द से खड़कती है  दर्द का कोई ना होता है और छोर  बेदर्दी तुझे भी यूँ दर्द  तो एहसास तो होगा  तू झूठा ही सही  तुझे मुझसे सच्चा प्यार होगा  तेरी हर बात से छल छलकता है  तेरे हर शब्द में स्वार्थ भरा है  लूट लेता है पूरी तरह से रस पूरा निचोड़ देता है  आता है मीठी मीठी बातें बनाता है  इसी बात पर भी भड़क जाता है  गलत को गलत कहो कैसे कहोगे भला  उसे तो बस अपनी तारीफ करवाना ही पसंद आता है  एक दिन जब याद करेगा अपनी मनमानियां  तो पछतायेगा  बहुत पछताएगा  बेदर्दी देखना एक दिन तू मेरे प्यार को तरस जाएगा  सीमा असीम

अहसास

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 अहसास भी बड़े कमाल के होते हैँ  तुम जो नहीं कहते वो भी कह जाते हैँ  कभी रुलाते हैँ जीभर के  कभी मुस्कुराने को मजबूर कर जाते हैँ  घृणा तो कभी द्वेष की भावना को दूर करते हुए   मन में  प्रेम को जगाते हैँ  यह अहसास न होते तो कैसे आते  जीवन में सच्चे भाव  अहसास ही दुनिया में किसी को भी  सही से इंसान की पहचान करना सिखाते हैं...  सीमा असीम  11, 10, 20
 जब हम तो के सागर में गोते लगा रहे होते हैं और हम बेतहाशा आंसू बहा रहे होते हैं उसमें हमारा मन चाहता है कि कोई हमारे सर पर हाथ से राय कंधे थपथपाई पीठ सहला आए और अपने गले से लगा कर कहीं मत रो मत रो मैं हूं ना तुम्हारे साथ लेकिन तब हमारे आस पास ऐसा कोई नहीं होता जो हमें समझा सके हमें बहला सके हमारे दुख को दूर कर सके और यह दुख हमें होते क्यों है इसलिए होते हैं कि हम जिस पर बहुत विश्वास करते हैं बेतहाशा विश्वास करते हैं और वह हमारे विश्वास को तोड़ देता है हम फिर उस पर विश्वास करने लगते हैं पुरानी बातों को भूल कर फिर वह हमारा विश्वास तोड़ देता है और बार-बार वह हमारा विश्वास तोड़ता है हम अपने विश्वास की टूटने पर दुखी होते हैं किसी अपने के द्वारा विश्वास तोड़ने पर दुखी होते ना जाने वह कैसे सोचता होगा ना जाने उसके मन में क्या होता होगा ना जाने वह ऐसे क्यों करता होगा जो हमारा अपना है वह हमें क्यों चूर-चूर कर बिखेर देना चाहता है क्यों हमारे दुख को  बढ़ा देना चाहता है क्यों हमें इतना कष्ट देना चाहता है मुझे नहीं पता नहीं पता नहीं पता हम तो सिर्फ आंसू बहाते हैं और अपने दर्द में डूब जाते है...
हमारा बरेली   इतिहास के पन्नों पर अगर देखा जाए तो हमारा बरेली महाभारत काल में पांचाल देश के नाम से जाना जाता था क्योंकि द्रोपदी का जन्म यहां पर हुआ था और द्रौपदी की जन्म स्थली हमारा बरेली ही था महाभारत काल में राजा द्रुपद यही राज करते थे, दरअसल द्रौपदी की जन्म स्थली बरेली थी और वह पांचाली कही जाती थी क्योंकि वो पांच पतियों की पत्नी थी इस वजह से बरेली को पांचाल प्रदेश भी कहा जाता था...  सीमा असीम   बरेली कॉलेज की स्थापना 1837 में  हुई थी और उस समय ब्रिटिश हुकूमत थी,  18 57 में ज़ब क्रांति का बिगुल बजा तो रुहेलखण्ड  में इस आंदोलन की बागडोर रोहिल्ला सरदार खान बहादुर खान के हाथों में थी उनकी अगुवाई में क्रांतिकारी अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे बरेली कॉलेज का शिक्षक मौलवी महमूद हसन और फारसी शिक्षक कुतुब शाह समेत तमाम छात्र इस आंदोलन में शामिल हुए थे कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ कार्लोस बक को क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया था सीमा   औरंगजेब के शासनकाल के दौरान और उसके बाद भी उसकी मृत्यु के बाद भी बड़े बरेली और उसके आसपास के क्षेत्र में अफगान बस्...