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अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, अति का भला न बरसना, अति की भ न धूप। यही तो सच है न कि इतना भी मत बोलो कोई तुम्हें सुने ही न तुम पर ध्यान ही दे या टूमेन कुछ समझे ही न और इतना चुप भी मत रहो कि सब शून्य हो जाये खत्म हो जाये और आप मूरखों की तरह से सब देखते ही रहो जैसे ज्यादा बारिश हो तो कुछ भी अच्छा नहीं लगता ऊभ सी पैदा हो जाती कि क्या टिपिर टिपिर लगी पड़ी है अब तो मौसम साफ हो जाये यह बारिश नहीं लुभा रही दुख दे रही है वैसे ज्यादा धूप भी परेशान करती है और तपा देती है लगता है थोड़ी तो छाँव आए ,,,बस यही मतलब है कि अति या ज्यादती हर चीज की कष्ट प्रद होती है .... सीमा असीम  27,2,20 
नम है आँख दर्द छलक गया  तेरी हर बात कमाल जो है  सुनो, मैं अगर सच कहूँ तो आँखों का छलकना खुशी में भी होता है और गम में भी लेकिन छलक़ती आँख ही है भले ही दिल खुश हो या दुखी ! इस दुनिया में कुछ भी शाश्वत नहीं है ,,शायद प्रेम भी अब शाश्वत नहीं रहा ,,,  क्योंकि इस नश्वर दुनिया में स्वार्थ हद से ज्यादा बढ़ रहा है ,,, हद से ज्यादा खुद के प्रति सोचना ही इंसान को पाप का भागी बना रहा है ,,,,खैर क्या फर्क पड़ता हैकि iइस दुनिया मे क्या हो रहा है ,, क्या घट रहा है , , फर्क तो तब पड़ता है जब हामरे अपने गलत हो या कुछ गलत कर रहे हो .... सीमा असीम  26,2,20 
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अब तक जो कुछ सीखा है बस इतना सीखा है  ....कि मूर्ख को मूर्ख बनाने से क्या फायदा .... बिलकुल सच है मूर्ख को दगा दे देना ,, धोखा दे देना उसके साथ छल कपात करके उसका सब कुछ छीन लेना लेकिन उस मूर्ख को तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि वो दिमाग वाली दुनिया को जानता ही नहीं है उसे नहीं पता होता है कि उसके साथ कोई गलत कर रहा है या सही कर रहा है ॥,,, उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता है वो पहले कि तरह ही हँसता है मुसकुराता है गाता है और अपनी ही दुनिया में खुश रहता है ....उसके मन कि दुनिया बेहद खूबसूरत और प्यारी होती है जहां वो अपनी सच्चाई और ईमानदारी के साथ मगन रहता है ....  निर्मल मन जन सो मोही पावा  मोही कपट छल छिद्र न भावा ... सीमा असीम  25,2,20 
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हमने तो दुनिया को बाँटी थी मुस्कान मेरी आँखों में आँसू हैं तो आखिर क्यों दिल हमेशा यही कहता रहता है कि क्या गुनाह किए थे क्या अपराध किया कोई जो आँख नम हो जाती हैं बार बार उदासी में घिर जाती हूँ न जाने क्यों सोचती हूँ तुम्हें और दुनिया को ? और सोच सोच कर खुद को ही तबाह कर लेती हूँ मिटा लेती हूँ मैं खुद को .... अगर मैं हूँ तब ही यह दुनिया है बस यही नहीं सोच पाती और दुखों से नाता जोड़े रहती हूँ जबकि खुशियाँ हमारे आसपास हैं और हम मूरखों की तरह से अपने आप को दुख के सागर में डुबाये रहते हैं  ,,,,,, मुस्कान सजा होठों पर और गम को गले लगा ले गम रहेंगे साथ तो खुशियाँ खुद आयेंगी ,,,, सीमा असीम 24,2,20
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मोहे लगे प्यारे सभी रंग तुम्हारे कि पग पग लिए जाऊँ तेरी बलइयाँ .... तुम सुनो न , सुनते क्यों नहीं , क्या तुम्हें आवाज नहीं आ रही है , क्या तुम अब ऊंचा सुनने लगे हो शायद हाँ तभी तो तुम्हें न कोई आवाज आती है , न कोई अहसास होता है , हाँ तुम्हें कुछ भी महसूस नहीं होता है क्योंकि अगर तुम्हें महसूस हो रहा होता तो तुम न इतने दर्द देते , न ही दुख देते , क्योंकि जब हामरी आँखों में इतने आँसू भर दिये कि मुझे दिखना भी बंद हो गया , दुनिया से मोह ही खत्म हो गया कुछ भी अच्छा नहीं लगना , और खुद में ही खो जाना ,,, वैसे खुद में खोना या खुद को जीना ही ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है ,,,, सीमा असीम 23,2,20
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मेरा नया उपन्यास  हम नहीं जानते थे कि दुनिया में नफरत ज्यादा है और प्रेम बहुत कम ! बस ठोकरें लगती गयी हम समझते गए और ठोकरें भी हमारे अपनों की हो तो हम ज्यादा समझदार होते जाते हैं लेकिन क्या हम समझदार हुए ? नहीं न, क्योंकि हम अपनों से इतना प्रेम करते हैं , इतना अपना समझते हैं कि उनकी हर गलती को माफ करके चुपचाप अकेले दुख सहते रहते हैं , इसके बाद भी वे अपनी गलती को सुधारते नहीं हैं बल्कि वही गलतियाँ बार बार करते जाते हैं जिनसे हमें दुख हो और वही होता है ! हम दुख के सागर में डूबते चले जाते हैं पर उन अपनों से कुछ नहीं कहते जो  न हमें समझते हैं न ही हमारे दुखों को ! वैसे जो हमारे दुख को जरा भी नहीं समझे, हमारे अशकों की कदर न करे ? वो हमारा कैसे हुआ ? कैसे उसे हम अपना कह कर खुद का वलिदान करते रहते हैं ? कैसे उसको बढ़ावा देते रहते हैं ? क्यों हम अपने मन को समझा नहीं पाते हैं ? कैसे अपने दिल को दुखाते चले जाते हैं ? कैसे घायल किए जाते हैं ? आखिर क्यों ? किसके लिए ? उनके लिए जो अपने पन का मतलब तक नहीं जानते , अपनों के दुख तक नहीं जानते या हम खुद ही अपने दुख को सुख में बदलने के लिए ...
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परवाह  परवाह करो उन रिश्तों की जो तुम्हारे अपने हैं तुम्हें प्रेम करते हैं तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी करते हैं मिटा कर और झुका कर खुद को तुम्हें आवाद करते हैं क्योंकि दुनिया में तुम्हें सब मिलेगा लेकिन प्रेम नहीं मिलेगा और न ही सच्चा विश्वास मिलेगा  ...... सीमा असीम  मेरा नया उपन्यास