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चाँद के आने से जो हल्की सी मुस्कान की रेखा आती है  बस वही तो जिंदगी है, हाँ सिर्फ उतनी सी ही जिंदगी है !! सुनो प्रिय,             जब मैं तुम्हें उकेरने लगती हूँ तब वो रब स्वयं आकर मेरी सामने बैठ जाते हैं मंद मंद मुस्कराते हुए और मैं रचने लगती हूँ एक विलक्षण संसार जहां तुम होते हो मैं होती हूँ और होता है .........तुम और मैं मिलकर बन जाता है हम .........वहाँ सिर्फ हम होते हैं न्सिर्फ हम ,,,,,,,ओ मेरे प्रिय ,मेरे दिल पर एकक्षत्र राज करने वाले चाँद  जब तुम चंद पलों के लिए आसमा में आ जाते हो न तो पूरी धरती उस रोशनी से चमक उठती है ....अंधेरी रात में कोहरे में छुपे रात्रि के वे पल स्वयं पर गर्व कर उठते हैं और पल भर को तो मानों ये धरती ये आसमा ये रात का समय सब कुछ ठहर जाता है .....थिर हो जाता है ...और सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही पुष्प वर्षा करने लगता है और उस सुगंध से महमहा उठता है पूरा वातावरण ......मैं बावरी सी होकर सिमट जाती हूँ खुद की ही बाहों में .... ये सच है कि मुझे प्रेम है तुमसे सच्चा प्रेम ....ये दिल की लगी है कोई दिल्ल...
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आपका नाम ले लेकर हमने अपनी रातों को संवारा है  कभी गुजारा है अमावस्या की रात को चाँद की राह में !! सुनो प्रिय,               रात तो गुजर गयी रोशनी की एक चमक के लिए क्योंकि  अमावस्या की रात चाँद आसमा में आता ही नहीं ! न गीत रचे जाते हैं न कोई रचना बस इंतजार होता है सुबह की पहली किरण का ! सर्दियों की रातें यूं ही बहुत अधेरी और सर्द होती हैं !    एक झलक चाँद की पाने भर से ही शरीर में कुछ गर्माहट का अहसास होता है ! लेकिन प्रिय आज रात भर मन बहुत ही बेचैनी से भरा रहा कि जब चाँद आसमा में नहीं आता है तो वो कितना परेशान हो जाता होगा ...हद से ज्यादा मुस्कराता होगा ......अपने गम छुपाने के लिए ........प्रिय आप जानते हो न कि तन्हाइयाँ बहुत दर्द देती हैं ...बहुत तकलीफ से भर देती है ......लेकिन उस वक्त हम यह कैसे भूल जाते हैं कि वो भी तो इतना ही उदास और तन्हा होंगे .....हाँ प्रिय यही सच है कि हम अपने स्वार्थ में अंधे होकर सिर्फ अपने दुखों को दर्द को लेकर बेचैन होते हैं रोते हैं लेकिन हम आपका गम आपका दर्द आपकी ...
दिल की अतल गहराईयों में तुम्हें बसा लिया है रग रग में सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम लिख लिया है ज़रूरत नहीं रही दुनियाँबी दिखावे की मुझे इस तरह चाहा और तुम्हें अपना बना लिया है मिटाया है मैनें ख़ुद को तेरी चाहत में सनम आँखों में बस तेरा ही अक्स बसा लिया है जाओगे भला कैसे तुम मुझसे दूर होकर इस तरह से मन से मन को मिला लिया है ! ! सीमा असीम
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seema aseem तुम मेरे मन में शोर मचाते हो चीखते हो चिल्लाते हो घमासान सा मचा देते हो भीतर से पिघलाते हो और आँखों से वाष्प बन कर बहा देते हो इतना बेचैनी से भर देते हो कि सारा चैन खो जाता है सारा सकूं चला जाता है घबरा जाती हूँ मैं उदासियों को समेट कर अपने आसपास उनसे लिपट कर पूरी दुनियाँ को भूल जाती हूँ उनसे ही करके अपना शृंगार एक बेजान जिस्म में तब्दील हो जाती हूँ बेजान बन जाती हूँ ! ! सीमा असीम
मैं कोमल डाली सी झुक जाती हूँ तुम और झुका देते हो मैं फ़िर कुछ और झुक जाती हूँ तुम बार बार झुकाते जाते हो आखिर कितना झुकाओगे मुझे मैं तिनका तिनका होकर बिखर जाऊँगी बिखरती तो अभी भी हूँ समेट लेती हूँ ख़ुद को ख़ुद ही ज़्यादा तोड़ा तो कहीं की नहीं रह पाऊंगी हाँ मिट जाऊँगी और प्रीत अपनी अमर कर जाऊँगी प्रेम को अमर कर जाऊँगी सदा सदा के लिये ! सीमा असीम
चिड़ियाँ सा चहचहाता है मन कभी और कभी उदास हो डाली को चोंच सा कुरेदता है मन बैठ जाता है उदास निराशा होकर चोंच में पकड़े दाने को गिरा देता है जमीं पर एकटक एक ही दिशा में निहारता है मन क्यों ले गया उड़ा के कोई मन क्यों कार दिया बेजान बेजार मन क्यों घूमता है बावला सा होकर मन घोंसले के तिनकों को चोंच से नोचते हुए हताश चिड़िया सा मन तुम्हारी राह देखता हुआ ! ! ! सीमा असीम
बहुत प्यार है न तुम्हें पौधों से पेड़ों से रोपते रहते हो उन्हें यहाँ से वहाँ वहाँ से यहाँ सींचते भी हो न प्रेम भरे स्पर्श से सहला भी देते हो फल फूल पत्ती डाली सबको निहारते हो न दुलार से बहुत प्रेम है तुम्हें प्रकृति से प्रेमिका की तरह कोमल हृदय भी हो तो क्यों हो जाते हो कठोर क्यों नहीं कभी मेरा ख़याल जो तुम्हें मानती है अपना प्रेमी करती हूँ सच्चे दिल से तुम्हारी परवाह बार देती हूँ अपना सबकुछ तुम्हारी ख़ुशी के लिये क्या तुम्हें ज़रा भी फ़िक्र नहीं होती ? ? सीमा असीम