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प्रेम स्वांस है प्रेम धड़कन है  प्रेम जीवन है प्रेम रवानी है  प्रेम अश्क हैं प्रेम सावन है  प्रेम मौसम है प्रेम फिजा है  प्रेम युवा है प्रेम हरदम युवा है  प्रेम मासूम है हर छल से दूर है प्रेम निश्छल है प्रेम निश्छल है  प्रेम जीवन है सिर्फ जीवन है  प्रेम मुस्कान है शान है एक पहचान है  प्रेम शब्द में ही जान है, जान है  प्रेम सच है प्रेम शाश्वत है  प्रेम दिवानगी है, नशा है  प्रेम जादू है प्रेम आँसू है  पास रहती सदा फिर भी नहीं पास हूँ नस नस में हो मेरी रूह में हो तुम हर आलम में तुम हर मौसम में तुम  सुबह में शाम में आसमा में  चाँद में तुम हो सूरज में तुम  तारों में तुम सारी दुनियाँ में तुम  तुम ही तुम हाँ मेरे राँझे सिर्फ तुम ही तुम  काशी में तुम काबा में तुम  मकके में तुम मदीने में तुम  चारो दिशाओं में तुम चारो धामों में तुम  हर तरफ तुम हर तरफ तुम  हाँ प्रिय तुम ही तुम नदियों में तुम सागर में तुम  मेरी पायल की झंकार में तुम  मेरे हँसने में रोने...
गतांक से आगे  रिया मुस्करा दिल का हर तार बस आपसे जुड़ा है तुम मुस्कराओ तो नम आँख मेरी मुस्कराये हर शय दुआ मांगती हूँ आपके लिए  मेरा रब मेरी हर उल्फत पे निसार हो जाये !! सुनो प्रिय          मेरा मन तो हर वक्त न जाने क्यों तुम्हारी खुशी में खुद को निसार किए रहता है क्या तुम खुश हो ?यह जानकर कि तुम परेशान हो मन रो पड़ता है,दुखी हो जाता है , उदास हो जाता है , गम में डूबने लगता है ...मेरे प्रिय प्रेम तो हो जाता है इसे किया नहीं जाता है मेरा मन हर वक्त में गर तुम्हें याद करता है तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है ॥हर वक्त आपके लिए दुआ मांगता है तो मेरा क्या कसूर है ? हर पल तुम्हें निहारना चाहता है, इबादत करना चाहता है,सजदा करता है ,तो इसमें मेरा क्या दोष है प्रिय ?? तुम जरा सा भी अहसास दिला जाते हो तो लगता है मानों दुआ कबूल हो गयी, ऐसा लगता है जैसे खुदा खुद सामने आकर खड़ा हो गया है ॥ प्रिय मैं तो सिर्फ आपका ही नाम कलमा की तरह रटती हूँ क्योंकि  मेरा प्रेम सिर्फ आपके ही सदके है॥ इसमें न तो कोई धर्म है, न जात है सिर्फ आप ही मेरा रब ह...
 गतांक से आगे  रिया मुस्करा  सुनो प्रिय, बेचैन मन घबराहट से भरकर तुम्हें ढूँढने लगता है तुम्हें ज़ोर से आवाज देकर पुकारने लगता है ...प्रिय, मेरे प्रिय कहाँ हो तुम ?कहाँ हो ? कि तुम आ जाते हो ...कैसे सुन लेते हो? कैसे मिल जाते हो ? मेरे सच्चे मन के पवित्र प्रेम, तुझ पर मेरी जां निसार है ,,,तुम्हारा इंतजार है कि तुमसे प्यार है ...  प्रिय न जाने क्यों मन उदास है,, न जाने क्यों दिल घबरा रहा है,, हद से ज्यादा परेशान है॥इतना कि जी चाहता है सब कुछ छोड़ कर दुनियाँ जहां से दूर चली जाऊँ ...रोम-रोम से बस एक ही आवाज आ रही है कि प्रिय गलत हो रहा है कहीं तभी तो मन की बेचेनियां बढ़ती जा रही हैं ...इतनी तकलीफ तो कभी न थी कभी इतनी मुश्किल न थी ...दिन रात सब एक से हो गए हैं ...मन करता है कि रब कहीं मिल जाये तो उससे जाकर पूछ लूँ कि आखिर गलत क्या था कुछ भी तो गलत नहीं था फिर क्यों इतनी परीक्षाएँ ...क्यों इतनी कठिनाई ...प्रिय न तुम गलत थे न मैं ...हम तो सही थे बस हमारे दिन थोड़े गलत हो गए कि हम इन दिनों को देखकर थोड़ा घबरा गए हैं लेकिन प्रिय तुम मत घबराना क्योंकि एक दिन सब सही हो जाएग...
कह दो न मैं हमेशा अपने मन की पल पल की भावनायें तुम्हें बताना चाहती हूँ जैसे आज मैं कितनी ख़ुश थी यह बात या आज कैसा मौसम था या आजकल सर्दी थोड़ा बढ़ गयी है  मैं बता देना चाहती हूँ कि रात की उदासी में मेरे मन की उल्लसित तरंगें तुम्हें अपने अंक में भरकर बाँट लेना चाहती हैं  तुम्हारी वो तकलीफ़ें जो तुम कह ही नहीं पाते कभी   मैं यह भी बताने की सोचती हूँ कि अगर मैं तुमसे नहीं कह पाती कोई बात तो कितनी तक़लीफ़ में जीती हूँ कितना दर्द होता है यूँ जैसे दुःख कि बदली छा गयी है मुझे खामोशियां उदासियां बिल्कुल अच्छी नहीं लगती तभी तो मैं स्वतः तोड़ देती हूँ मौन और कर लेती हूँ तुमसे बातें तब भी कहाँ कह पाती हूँ सब कुछ रह जाता है अधूरा पन सा क्योंकि मैं बताना चाहती हूँ अपनी उलझने सुलझने सही ग़लत झूठ सच सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक की एक एक बात बताकर एकदम पारदर्शी होकर ख़ुद को मज़बूत कर लेना चाहती हूँ क्योंकि कमज़ोर हो जाना ज़िंदगी न जीने के समान हो जाता है तो कह देना कभी फुर्सत में  अपने मन की बातें  सुख दुख सब  एक हैं अपने  कि...
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गतांक से आगे रिया मुस्करा  आजा पिया तोहे प्यार दूँ  सुनो प्रिय              बार बार तुम्हें पुकारता हुआ मेरा मन आज न जाने क्यों तुम्हें ज़ोर से आवाज देना चाहता है ॥न जाने क्यों तुम्हारे सारे दुख, सारे दर्द,सारी तकलीफ, सारे कलेश को मिटा देना चाहता है ...हाँ प्रिय आज तुम्हें अपने गले लगा लेने को जी चाहता है ...देखो मैंने अपनी बाहें फैला दी हैं ॥इस पवित्र ब्रह्म मुहूर्त में मैं खुशियों से लबरेज होकर तुम पर अपनी सारी खुशियाँ बार देने को ...तुम्हें मनचाही खुशी देने को ॥बुरी यादों को, बातों को मिटा देने को ....उतावला सा हुआ जा रहा है मेरा मन ...सुनो प्रिय मैं जानती हूँ जिंदगी बहुत खूबसूरत है ...बहुत प्यारी है ...इसका हर पल खूबसूरत है ॥हर क्षण मनोहर है... ...देखो प्रिय हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ बिखेर कर प्रकृति भी जश्न की तैयारी कर रही है ...हवाएँ मधुर धुन बुखेरती हुई गुनगुना रही है हल्की हल्की सर्द मौसम की शुरुआत हो गयी है ॥कडक धूप नर्म सी लगने लगी  है ...ऐसा लगता है मानों स्वयं उस रब ने ही सौंप दिया है दुनिया का सारा वैभव हमारी पव...
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गतांक से आगे  तेरा मेरा साथ रहे ! तेरा मेरा साथ रहे !!   रिया मुस्करा        सुनो प्रिय  यह कैसी कशिश है ॥यह कैसा जादू है ॥ यह कौन सा रहस्य है कि मैं तुमसे  जरा सी भी दूरी बनाती हूँ उतनी ही और ज्यादा तुम्हारी तरफ खींची चली आती  हूँ, सनम सच तो यह है कि तुमसे एक पल की दूरी ख्वाब में भी बर्दास्त नहीं है तो बताओ मैं कैसे तुमसे पल भर को अलग हो सकती हूँ !  मुझे लगता है कि अब मुझे दुनियाँ की कोई भी ताकत तुमसे जुदा नहीं कर सकती है हाँ प्रिय यह सच है ..चाहे तुम्हें इस बात का ख्याल रहे या  न रहे ... सुनो सनम अब मुझे कितना भी दर्द हो, या कितनी भी खुशियाँ हो लेकिन  बस तुम्हारा हाथ मेरे हाथ को कसकर पकड़े रहे ...बिना कोई कसम या वादे के और बिना किसी हक के तुम यूं ही हमेशा मेरे साथ चलते रहो ... प्रिय इस प्रातःकालीन मुहूर्त में मेरा लिखा एक एक शब्द अक्षरशः सच हो जाये मेरे प्रिय तुम्हें मेरे सच्चे प्यार का अहसास हो जाये ...जैसे मैं पल पल में तुम्हें अपने ख़यालों में रखती हूँ ठीक वैसे ही तुम भी मुझसे एक पल को भी  अपने ख...
गतांक से आगे  ये शब्द भर नहीं हैं प्रिय  ये मेरे हृदय का अंकन हैं  ये प्रेम भर नहीं है प्रिय  ये तेरे माथे का चन्दन है   सुनो प्रिय          मेरे पास तुम्हारे लिए बहुत सारे सवाल है लेकिन मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पास उनके कोई जवाब नहीं हैं इसलिए ही तुमसे पूछ कर तुम्हें तुम्हारी ही नजरों में गिराना नहीं चाहती लेकिन मैं जरूर पूछूंगी एक दिन तुमसे ...वो कयामत का दिन होगा क्योंकि अब उससे पहले मैं तुमसे बात करूँ तो शायद अब संभव ही न हो सके ....मैं हमेशा सोचती हूँ कि आईना भी तो कभी शर्म से गढ़ जाता होगा .....हैं न राज ?  राज एक बात बताओ ? इतने समय से तुम्हारे दिये किसी भी शब्द के बिना भी मैं अपने सारे शब्द तुम्हें दे रही हूँ ...अपना सारा समय ...अपने सारे अहसास ...अपनी वफा ...अपनी खुशियाँ ॥अपना पल पल ॥प्रतिफल सब तुम्हारे लिए और तुम्हारे पास एक पल का समय भी मेरे लिए नहीं है न ?तभी तो मैं सालों से अकेले रिश्ते को निभा रही हूँ ...तुम सिर्फ रिश्तों का फायदा उठाना चाहते हो ....क्या तुम मुझे इन सब का सिर्फ एक हिस्सा भ...