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तुम जब तुम आए,  तो लगा जैसे प्रेम ने मेरा हाथ थाम लिया.. मैंने कुछ नहीं कहा, बस तुम्हें देखा, और  मेरे भीतर कहीं एक दिया जल उठा... तुम्हारे बिना ये जीवन कितना सूना सूना  तुम मिले तो जैसे  हर साँस में प्रेम घुल गया... मैं कविता क्या लिखूँ, तुम ही तो मेरी सबसे सुंदर कविता हो प्रिय.. सीमा असीम 
 बेवफा के चेहरे पर कितनी सच्चाई दिखती थी  मानों वो खुदा का ही दूसरा रूप हो....
 दरअसल वो सबका होना चाहता था इसलिए वो न मेरा था न ही किसी और का.
 काश एक ऐसा शब्द जो हर किसी के मन में एक बार जरूर आता है मेरी मां में आता था मैं बार-बार इस शब्द को लिखती थी काश ,?  जब एक बार तुमने इस शब्द को मेरी रचना में देखा तो तुमने कहा था एक कांच क्यों हटा दो काश उसे दिन के बाद मैं किसी भी रचना में काश लिखना छोड़ दिया था कभी लिखने का मन भी करता तो तुम्हारी बात याद आ जाती थी और मैं उसे नहीं लिखती थी, पर आज तो मेरा मन कर रहा है कि मैं  इस शब्द को लिखूं कि काश , तुमने मुझे ना कहा होता काश मत लिखो, या मैं तुम्हारी बात ना सुनी होती नहीं मानी होती तुम्हारी बात.... सीमा असीम 
 आज की बात आज मैंने फिर खुद को याद दिलाया, कि ताज सिर पर हो तो ज़िम्मेदारी भी बड़ी होती है। मैं बिना मेहनत के कुछ नहीं चाहती। जो मिलेगा, अपनी लगन से मिलेगा। थकूँगी, पर रुकूँगी नहीं। मैं सिर्फ़ एक नाम नहीं, मैं एक कोशिश हूँ, जो हर दिन बेहतर हो रही है। • सीमा
उसका झूठ झूठ भी कितना सच्चा बोला था उसने, कि हमने सच को भी झूठ मान लिया। कहता था — तुम सी हो, तुम्हारे बिना मर जाऊँगा। आज देखो, हमारे बिना भी जी रहा है, और हम उसी झूठ पर आज भी जी रहे हैं। उसके झूठ में भी एक अदा थी, सच से ज्यादा मीठी सदा थी। हम लुट गए उस सदा पर, और वो जीत गया अपनी अदा पर। अब किसी के सच पर भी यकीन नहीं आता, जब से उसका झूठ सबसे हसीन लगा था।
है खुद पर यकीन इतना कि खुद के लिए, आसमान से तारे खुद ही तोड़ लाऊंगी एक दिन। ना किसी के इंतज़ार में आँसू बहाऊँगी, अपनी रोशनी खुद ही बन जाऊँगी एक दिन। जो छोड़ा था मुझे अंधेरे में अकेला, उसे दिखा दूँगी, मैं सूरज बन जाऊँगी एक दिन।
बेवफा प्रेम तुमने कहा था साथ निभाओगे, राह कोई भी हो, चल जाओगे। हमने तुम्हारे लफ्ज़ों को खुदा माना, और तुमने उसी खुदा को भुला दिया। वादा था चाँद-तारों जैसा, निभाना था उम्र भर वैसा। पर तुम तो चाँद निकले, जो हर रात जगह बदल लेते हैं। हम आज भी उसी मोड़ पर हैं, जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था। फर्क बस इतना है, अब हम रोते नहीं, मुस्कुराकर याद करते हैं। बेवफा तुम नहीं, तुम्हारा वक्त था, जो हमारे प्यार से बड़ा हो गया। और हम? हम आज भी वही हैं... तुम्हारे उस "हमेशा" का इंतजार करते हुए। सीमा असीम  23,8,26
 1. प्रेम प्रेम में बड़ा कुछ नहीं होता, प्रेम में छोटा भी कुछ नहीं होता  बस एक बोतल पानी रख देना, बस एक गलती पर मुस्कुरा  देना, और बारिश में चुपचाप बैठे रहना... 2. तुम तुम मिले फिर मिले  दूर जाकर भी  दूर गये नहीं  एक आदत बन गयी  और यह आदत रह गई, आदत ही तो है   कभी कहीं नहीं जाती यह आदत.. सीमा  22,8,26 3उदास  आज मन उदास है तो रहने दो, हर बात को समझना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बस यूँ ही तुम्हारा ख्याल आना  और हमेशा रहना प्रेम ही तो है..
 तेरे नाम की रोशनी से दिल रोशन है, तेरे नाम से ही मेरी हर सुबह रोशन है। तेरे नाम लिख दी है ये ज़िंदगी, तेरे नाम से ही मेरा हर अफसाना रोशन है... सीमा असीम  १८, 8, २६ 
 दिल एक मंदिर है और तुम उसमें रहते हो, हम तो बस तुम्हारी पूजा करते हैं। तुम बसे हो साँसों में इस तरह, हर धड़कन में सिर्फ तुम ही तुम रहते हो। प्यार हमारा अमर है, ये तो तय है, हम तो हर जन्म बस तुम्हारे ही रहते हैं सीमा असीम  16,8,26
  मैं हूँ यहाँ पर, तुम हो वहाँ पर, बीच में ये सावन की दीवार है  मैं मेहंदी लगाए बैठी हूँ, तुम यादों में उलझे बैठे हो, मैं तीज गा रही हूँ, तुम किस ख्याल में बैठे हो? आ जाओ न, ये दूरी सही नहीं जाती है  मुझे तो अब ये जुदाई बहुत रुलाती है  सावन की ऋतु यूँ ही न चली जाये  तेरी याद बेतरहा मुझे सताती है.. सीमा असीम  15,8,26
 तीज का त्यौहार आया, सखी, साजन का पैगाम लाया। हरी-हरी चूड़ियाँ खनकी, मेहंदी से गोरी हथेली महकी, झूले पड़े नीम की डाली पर, गोरी झूले, गीत गाए मतवाली पर। सावन ने भी चूनर ओढ़ी, बादलों ने भी बिंदिया जोड़ी, धरती दुल्हन सी सजी है आज, देखो तीज का कितना है नाज़।
  ना याद रहा कहाँ रखा काजल, ना याद रहा किससे क्या बोला, रसोई में नमक की जगह चीनी डाल दी, और हँस कर खुद से ही बोली - ये क्या कर दिया! आईना देखूं तो तू दिखे, ख्वाब देखूं तो तू दिखे, लोग कहते हैं खोई-खोई रहती हूँ, मैं कहती हूँ - हाँ, तुम्हीं में तो खोई रहती हूँ। जबसे इश्क हुआ तुमसे, मैं मैं न रही, बस तेरी हो गयी। सीमा असीम  14,8,26
 इश्क मेरा रूहानी इश्क मेरा रूहानी है, न छूने का, न पाने का। न लिपस्टिक के रंग में है, न ज़ुल्फों के ढंग में है, ये तो उस एक नज़र में है, जो तुमने चुपके से देखी थी। ये जिस्मों का सौदा नहीं, ये दिलों का वादा नहीं, ये तो रूह से रूह के मिलने की एक सादी सी कहानी है। तुम पास हो तो सुकून है, तुम दूर हो तो भी जूनून है, इश्क मेरा रूहानी है, हर साँस में बस तू ही तू है। सीमा असीम  14,8,26
मैं प्रेम में हूँ हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और अब मुझे सब सुंदर लगता है, हवाएँ भी गीत गाती हैं, और धूप भी मीठी लगती है। मैं प्रेम में हूँ, इसलिए आईने में खुद को ज्यादा देखती हूँ, हर बात पर मुस्कुराती हूँ, बिना वजह के। ये प्रेम ने क्या किया, दिल को इतना कोमल कर दिया, कि अब हर धड़कन बस, उसी का नाम लेती है। हाँ, मैं प्रेम में हूँ, और यही मेरे जीवित होने का, सबसे सुंदर प्रमाण है।
 यह प्यार क्यों होता है पता नहीं यह प्यार क्यों होता है, बिना पूछे, बिना बताए, बस हो जाता है। न शक्ल देख कर होता है, न नाम देख कर, ये तो बस एक एहसास है, जो दिल को छू जाता है। कभी एक बात से हो जाता है, कभी एक मुस्कान से, और कभी तो बस, किसी के होने भर से। ये प्यार क्यों होता है, इसका जवाब किसी के पास नहीं, बस इतना पता है, जब होता है, तो ज़िंदगी खूबसूरत लगने लगती है।
 चलो फिर से किशोरी बन जाते हैं, जब प्रेम का मतलब बस आँखों-आँखों में बात होती थी, एक छोटी सी चिट्ठी, और दिन भर की मुस्कान। चलो फिर से वो बचपन जीते हैं, जहाँ प्रेम में कोई हिसाब नहीं था, न कल की चिंता, बस आज में जीना था। न कोई दिखावा, न कोई दुनियादारी, बस एक सच्चा, सादा, सा पहली बारिश जैसा प्रेम। हाथ में हाथ हो या न हो, दिल में तो प्रेम है न, तो चलो, फिर से उसी मासूमियत से प्रेम करते हैं।
 किशोरी आँखों में जो एक सपना जगा था, वो आज भी इस दिल में वैसा ही सजा है। वो पहली धड़कन, वो पहली सी लकीर, समय बीता, पर न मिटी वो तस्वीर। लोग कहते हैं इश्क़ उम्र देखता है, पर इश्क़ तो बस दिल में ही बसता है। वो किशोरी आज भी कहीं भीतर रहती है, तेरे नाम की माला आज भी कहती है। शेष फिर क्या बचा? बस यही तो बचा है, प्रेम... जो हर जन्म में सिर्फ़ तेरा ही रहा है।
 शाम होते ही प्रेम मेरी आँखों में उतर आता है  मेरे मन में अहसास जगा जाता है  जैसे शाम को दिया जलता है,  बस वैसे ही उजाला कर जाता है। तुम्हें देखना प्रेम नहीं, तुम्हें सोचते हुए मुस्कुरा देना प्रेम है, तुम्हारा नाम सुनते ही अंदर कहीं कुछ खिल जाना प्रेम है मैं नहीं चाहती चाँद-तारे, न वादे बड़े-बड़े, बस तुम रहो, मेरे बुरे दिन में, मेरी थकी शाम में, मेरी खाली दोपहर में, मेरे पास। अगर कभी पूछो कि कितना चाहती हूँ, तो गिन नहीं पाऊँगी, बस इतना जान लो — जब तक साँस है, तुम हो, और जब तक तुम हो, मैं हूँ... तुम हो मेरे ही सदा ही  सीमा असीम  11,8,26