चक्की
चक्की चलाती महिला
जब इस तस्वीर को देखा तो मन में एक ख्याल आया,
पुराने जमाने के लोगों तक मुझे इस तस्वीर ने पहुंचाया
जहां होते होंगे गांव चक्की खेत खलियान और भरे पूरे मिटटी के घर
हालांकि अभी भी होते होंगे
पर नहीं दिखते कहीं ऐसे
कच्चे घर चक्की चूल्हा
जिसे देखते ही मन खुशी से भर जाए
मानों मन को सकुं का अहसास करा जाए
कितनी मेहनत करती पहले की औरतें
कितना काम करती घर की औरतें
जब वे सुबह सवेरे घर को साफ सुथरा करके लीप पोत कर
अपनी चक्की लेकर बैठ जाती
उसमें अनाज डाल कर पीसती
साथ ही और भी बहुत कुछ पीस लेती होंगी
आसपास कुछ और औरतें भी साथ में आकर भी बैठ जाती होगी
बोलते बतियाते हँसते मुस्कुराते कब उनका काम खत्म हो जाता होगा
पता ही नहीं चलता होगा संग साथ में किसी दुःख दर्द का भान भी नहीं होता होगा
यह मेहनती महिलायें कितना मेहनत करती सुबह से लेकर रात तक
घर के एक-एक काम को बड़ी लगन के साथ
करीने के साथ
करती रहती
कभी गाने गाती
कभी हँसती हंसाती
अपने दर्द को गानों में उतार देती और
अपने सारे काम निपटा देती
पर आज सब काम चुटकियों में मिक्सी पर हो जाता है
वो भी घर में काम करने वाली हाउस मेड की मदद से कि अब
समय ही नहीं है
ऊँची ऊँची इमारतों में रहने से
किसी को कहाँ कुछ पता होता है कि
जरा देखो तो कैसे चलाती हैं चक्की
कैसे लीपती पोतती हैं अपने घर आँगन को
और कैसे खुश रखती हैं खुद को
अपनी हाड़ तोड़ मेंहनत को करके
अपने काम को जी भर कर करके
यह गाँव की चक्की चलाती महिलायें |
सीमा असीम सक्सेना
25,1,26

Comments
Post a Comment