नित्या और जिम्नास्टिक वाली छत
बड़े शहर में, जहाँ ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें आसमान को छूती हैं और नीचे दिन भर गाड़ियाँ भागती हैं, वहाँ 15वीं मंजिल के एक छोटे से फ्लैट में रहती थी नित्या।
नित्या के घर के सामने कोई बड़ा मैदान नहीं था। नीचे पार्क था भी तो वहाँ इतनी भीड़ होती थी कि भागने-दौड़ने की जगह ही नहीं मिलती थी। इसलिए नित्या घर में ही सोफे पर से कूदती, बालकनी में लुढ़कती रहती।
पापा कहते, "अरे ये तो बंदरिया है!"
मम्मी कहतीं, "इसकी एनर्जी को कहीं तो लगाना पड़ेगा।"
एक दिन सोसाइटी के नोटिस बोर्ड पर एक पोस्टर लगा देखा -
"सनशाइन जिम्नास्टिक अकादमी - अब हमारे क्लब हाउस में! 5 से 10 साल के बच्चों के लिए।"
नित्या की आँखें चमक गईं। "मम्मी, मुझे जाना है!"
अकादमी बड़े शहर जैसी ही थी - शीशे की दीवारें, रंग-बिरंगा बड़ा सा हॉल, नरम-नरम मैट, और हवा में उड़ते हुए रिबन। वहाँ शहर के अलग-अलग कोनों से बच्चे आते थे। कोई अंग्रेजी में बात करता, कोई हिंदी में, पर सबको एक ही चीज़ आती थी - उछलना!
शुरू में नित्या को बड़ा अजीब लगा। बाकी लड़कियाँ तो पहले से ही हैण्डस्टैंड कर लेती थीं। बड़े शहर के बच्चे, सब फास्ट-फास्ट सीखते हैं। नित्या जब बैलेंस बीम पर चढ़ी तो डर के मारे नीचे उतर आई।
कोच सिमरन मैम ने कहा, "बड़े शहर में सब कुछ तेज़ भागता है, नित्या। मेट्रो, लिफ्ट, इंटरनेट। पर जिम्नास्टिक स्लो चीज़ है। यहाँ शरीर को सुनना पड़ता है, जल्दी नहीं करनी।"
नित्या ने बात गाँठ बाँध ली।
अब रोज़ स्कूल, फिर होमवर्क, और शाम को एक घंटा क्लब हाउस। धीरे-धीरे उसकी बॉडी खुलने लगी। फ्लैट की छोटी सी जगह में भी वो प्रैक्टिस करने लगी। मम्मी हँसतीं, "हमारा तो पूरा घर ही जिम्नास्टिक हॉल बन गया है!"
तीन महीने बाद सोसाइटी में स्पोर्ट्स डे था। बड़े-बड़े लोग, लाइटें, कैमरे। सब बच्चों ने कुछ न कुछ किया।
फिर आई नित्या की बारी। म्यूजिक बजा - तेज़ शहर वाला म्यूजिक! नित्या दौड़ी, मैट पर कार्टव्हील किया, फिर रिबन को घुमा-घुमा कर हवा में बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बनाईं, और आखिर में एक लंबी सी जंप लेकर ऐसे रुकी जैसे अभी-अभी चाँद से कूद कर आई हो।
नीचे वाली आंटी चिल्लाईं, "अरे वाह! ये तो हमारे फ्लैट वाली नित्या ही है क्या?"
पापा ने वीडियो बनाया और बोले, "बड़े शहर की छोटी सी जगह में भी अगर दिल बड़ा हो, तो उड़ने के लिए पूरा आसमान मिल जाता है।"
नित्या उस रात 15वीं मंजिल की बालकनी से शहर की लाइटें देख रही थी और सोच रही थी - कल कौन सी नई छलांग सीखूँ?
नित्या और उसकी उड़ान वाली जिम्नास्टिक
एक था छोटा-सा शहर, उसी शहर में रहती थी 7 साल की नित्या।
नित्या को उछलना-कूदना बहुत पसंद था। सोफे से कूदना, पार्क में पेड़ की डाली पकड़ कर लटक जाना, चटाई पर लुढ़क जाना - बस दिन भर यही चलता रहता।
एक दिन मम्मी ने कहा, "नित्या, इतना उछलना अच्छा लगता है तो क्यों न तुम्हें जिम्नास्टिक क्लास में डाल दें?"
नित्या खुशी से उछल पड़ी - "हाँ, हाँ, मुझे तो बिल्कुल तितली की तरह उड़ना है!"
अगले दिन से नित्या जिम्नास्टिक क्लास जाने लगी। वहाँ नीला मैट बिछा था, रिबन थे, बॉल थी, और एक बहुत प्यारी कोच थी - अनीता दीदी।
पहले दिन अनीता दीदी ने कहा, "आज हम स्ट्रेचिंग सीखेंगे।"
नित्या ने देखा, बाकी बच्चे आसानी से पैर मोड़ कर बैठ रहे हैं। उसने भी कोशिश की - पर धड़ाम! वो पीछे लुढ़क गई। सब हँस पड़े। नित्या का मुंह छोटा हो गया।
घर आकर वो बोली, "मम्मी, मुझसे नहीं होगा। मैं तो सबसे अलग हूँ।"
मम्मी ने मुस्कुरा कर कहा, "बेटा, अलग होना बुरी बात नहीं। और याद है, तितली भी एक दिन में उड़ना नहीं सीखती। पहले वो धीरे-धीरे पंख फड़फड़ाना सीखती है।"
अगले दिन नित्या फिर गई। इस बार वो गिरी, फिर उठी। फिर गिरी, फिर उठी। अनीता दीदी ने कहा, "जिम्नास्टिक में सबसे जरूरी है - गिर कर उठना।"
धीरे-धीरे जादू होने लगा।
एक हफ्ते बाद नित्या ने कार्टव्हील करना सीख लिया।
दो हफ्ते बाद उसने रिबन को हवा में घुमाकर इंद्रधनुष बनाना सीख लिया।
और एक महीने बाद... उसने अपना पहला स्प्लिट कर दिखाया!
अनीता दीदी ने तालियां बजाईं, "शाबाश नित्या!"
फिर आया स्कूल का एनुअल डे। स्टेज पर नीली लाइट थी। नित्या ने गुलाबी फ्रॉक पहनी थी। जैसे ही म्यूजिक बजा, नित्या दौड़ी, उछली, घूमी - कभी तितली बनी, कभी लहर बनी। आखिर में उसने एक सुंदर सी छलांग लगाई और सबको प्रणाम किया।
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
मम्मी की आँखों में खुशी के आंसू थे। नित्या दौड़ कर उनके पास आई और बोली, "मम्मी, मैं उड़ गई!"
मम्मी ने कहा, "हाँ बेटा, क्योंकि तुमने हार नहीं मानी।"
इस कहानी से सीख:
जो बच्चा रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास करता है और गिर कर भी उठ जाता है, वही एक दिन सबसे ऊँची उड़ान भरता है।
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